नवगछिया : भवानीपुर का दक्षिणेश्वर काली मंदिर दो सौ वर्ष पुराना है। यहां आसपास के जिलों के अलावे पड़ोसी राज्यों पश्चिम बंगाल, झारखंड से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मइया की पूजा अर्चना और चढ़ावा चढ़ाने के लिए आते हैं। मुख्य पुजारी प्रभात झा और अमित झा द्वारा विधि विधान से मैया की पूजा अर्चना की जा रही है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!बच्चों ने खेल खेल में दी थी कुश से बलि :
गांव के विश्वास झा और त्रिपुरारी भारती बताते हैं कि बुजुर्गों का कहना है कि सोनरा बहियार में परिवार के बच्चों ने खेल-खेल में पहले मिट्टी से मां काली की प्रतिमा बना दी। इसके बाद बच्चों ने किसी का पाठा पकड़ लाया और काली माता का जयकारा लगाते हुए उस पाठा के गर्दन पर कुश चला दिया। देखते ही देखते पाठा की बलि चढ़ गई। यह देखते ही बच्चे घबरा गये और भागते हुए सभी अपने-अपने घर पहुंचे। घर पर बच्चों ने घटना के बारे में बताया। तत्काल बुजुर्गों के कहने पर बच्चों ने मां काली की निर्मित मिट्टी की प्रतिमा को गंगा जल में विसर्जित कर दिया। उसी रात बालमुकुंद पोद्दार के पिता भूसी पोद्दार को मां काली ने स्वप्न में दर्शन दिया और कहा कि मेरी प्रतिमा गंगा जल से निकालकर मंदिर में स्थापित करो और मुझे पाठा की बलि चढ़ाओ। तब भूसी पोद्दार ने ग्रामीणों की मदद से गंगा जल से मां काली की मिट्टी की निर्मित प्रतिमा निकालकर भवानीपुर में स्थापित किया। तब से बालमुकुंद परिवार के वंशज द्वारा मूर्ति पूजा प्रारंभ हुई।
गांव से सार्वजनिक मंदिर में स्थापित हुई प्रतिमा :
कहा जाता है कि जब बालमुकुंद के परिवार वाले पूजा की पूरी व्यवस्था करने में अक्षम होने लगे तो ग्रामीणों ने सार्वजनिक मंदिर का निर्माण करा कर माता को स्थापित किया गया। प्रतिमा स्थापित होने के बाद आज भी बालमुकुंद पोद्दार के वंशज भूसी पोद्दार के घर से नैन व बलि देने की प्रथम पद्धति प्रथा चली आ रही है। नैन पड़ते ही मइया को बलि चढ़ाया जाता है।

मुरादें पूरी होने पर चढ़ाते हैं भेंट :
मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से मां काली का सुमिरन कर मुराद मांगते हैं और जब उनकी मुरादें पूरी हो जाती है तो श्रद्धालु सोने व चांदी की बिंदी, पाठा, झांप, नथ-टीका, मुंडमाला, पायल सहित अन्य तरह का चढ़ावा चढ़ाते हैं।
काली पूजा पर कार्यक्रम का होता है आयोजन :
दीपावली की रात्रि में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ प्रतिमा स्थापित किया जाता है। इसके दूसरे दिन रात्रि 8 बजे से कलाकारों द्वारा देवी भक्ति जागरण व झांकी का आयोजन होता है। संध्या 5 बजे प्रकांड विद्वानो द्वारा महाआरती का आयोजन किया जाता है।
