वट सावित्री: 9 साल बाद 3 जून को रोहिणी नक्षत्र और सोमवती अमावस्या विशेष सिद्धि योग

धर्म

इस बार 9 साल बाद 3 जून को रोहिणी नक्षत्र और सोमवती अमावस्या एक तिथि को होने से विशेष सिद्धि योग बन रहा है। इसी दिन वट सावित्री व्रत है। सुहागिनें पति की लंबी उम्र की कामना के लिए यह व्रत करतीं हैं। गौशाला मंदिर के पंडित द्यानद पाण्डेय ने बताया कि वट सावित्री पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 8:30 बजे से दाेपहर 3:39 तक है। अति विशिष्ट फलदायी राेहिणी नक्षत्र का संयोग हाे रहा है। साेमवती अमावस्या के दिन यह व्रत हाेने से सुहागिनों के लिए विशेष फलदायी एवं सिद्धि दायक हाेगा। मान्यता है कि इस व्रत को करने से अखंड सौभाग्यवती का वरदान मिलता है।

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महिलाएं इस दिन वट वृक्ष की पूजा करती हैं। महान पतिव्रता सती सावित्री ने इसी व्रत काे किया था। जिससे वे अपने मृत पति सत्यवान काे धर्मराज से जीत लिया था। शास्त्र के अनुसार वट वृक्ष काे देव वृक्ष भी माना जाता है।

वट वृक्ष के जड़ में ब्रह्माजी, तने में भागवान विष्णु, शाखाअाें व पत्तियाें में भगवान शिव के साथ माता सावित्री निवास करती हैं। इसलिए इसे अक्षय वृक्ष भी कहा जाता है। अक्षय वृक्ष के पत्ते पर श्रीकृष्ण प्रलयकाल में मार्केडेय ऋषि काे दर्शन दिए थे। यह वट वृक्ष वेणी माधव के निकट स्थित है।

व्रत और पूजन विधि
सुहागिनें सुबह स्नान आदि से निवृत्त हाेकर साेलहाें शृंगार कर बांस की डलिया में फल पकवान भरकर वट वृक्ष की पूजा करती हैं। पूजा के दाैरान वट वृक्ष के समीप सावित्री-सत्यवान की कथा कही अाैर सुनी जाती है। पूजन सामग्री में गंगाजल, अक्षत, रक्षासूत्र, चना, फूल, सिन्दूर, धूप से वट वृक्ष की पूजा की जाती है। कच्चा धागा वट वृक्ष में पांच या सात बार लपेट कर महिलाएं उसकी परिक्रमा करती है। बरगद के पेड़ के पूजन करने से महिलाअाें काे अखंड सौभाग्यवती हाेने का वरदान प्राप्त हाेता है।