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बिहार की नंदनी शर्मा के प्रतिभा का लोहा मान रहा बॉलीवुड और साउथ सिनेमा में बिखेर रही जलवा

कौन कहता है छोटे शहरों से बड़े सपने पूरे नहीं होते… नंदिनी शर्मा इसी का जीवंत उदाहरण है। बिहार के मुज़फ्फरपुर की नंदिनी शर्मा, आज मुंबई में अपनी प्रतिभा के बदौलत अपना धाक जमा चुकी है।

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नंदिनी शर्मा आज के दौर की एक चर्चित अदाकारा और वाइस ओवर आर्टिस्ट हैं। उन्होंने कई बड़ी फिल्मों और सीरीज में अपनी आवाज़ दी है। इतना ही नहीं वो एक अच्छी लेखिका भी है।

नंदनी इंग्लिश फिल्मों की स्क्रिप्ट का हिंदी रूपांतर भी करती हैं। चर्चित ऑस्कर विजेता फिल्म पैरासाइट में न सिर्फ उन्होंने आवाज़ दी है, बल्कि उसका हिंदी रूपांतरण भी किया है।

नंदनी ने चर्चित वेब सीरीज प्लेटफार्म नेटफ्लीक्स पर आने वाले सीरीज सबरीना में अपने काम का झंडा गाड़ा है। उन्होंने और भी बहुत काम किया है… जैसे की, नेवर हैव ऑय एवर, लुनैटिक्स, ऑय-लैंड नाम के चर्चित सीरीज में।

नंदनी ने साथ ही कई दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी रूपांतरण में भी अपनी आवाज़ दी है जैसे की मधुराराजा, गीता गोविन्दम इत्यादि।

उन्होंने अपने काम का लोहा शार्ट फिल्मों में भी मनवाया है। हाल में ही उनकी एक शॉर्ट फ़िल्म भी रिलीज हुई है । जिसका नाम है “झाँसा” इसमें उन्होंने नजिया सिद्दीक़ी का किरदार निभाया है।

थिएटर की दुनिया में अपनी दमदार अदाकारी का परिचय दे चुकी है और पिछले पाँच साल से नंदनी थिएटर एक्टिंग कर रही हैं।

नंदिनी का शुरुआती सफ़र मुज़फ्फरपुर में शुरू हुआ। उनका बचपन बहुत कठिनाई से गुज़रा, छाता चौक पर स्थित आईपीएस नामक स्कूल में उन्होंने शुरुआती पढ़ाई की फिर 16 साल की उम्र में उन्होंने दिल्ली का रुख किया। नंदनी ने इंजीनियरिंग की पढाई भी की है।

 

वो बताती है, मुजफ्फरपुर जैसे बिहार के छोटे शहर से होने की वजह से, कॉलेज में भी नंदनी का सफ़र कुछ आसान नहीं था। वो जानती थी की वो कला के लिए ही बनी हैं। माँ बाप की ख़ुशी के लिए उन्होंने कुछ साल नौकरी तो की, पर वो अपने अन्दर के कलाकार को मरते नहीं देख पाई…और फिर उन्होंने रुख किया मुंबई का। जहाँ उनके सपने तो पूरे हो जाते लेकिन शुरुआती दौर की कठिनाईयों से बचना मुश्किल था।

नंदनी मुजफ्फरपुर नॉउ से बातचीत में बताती हैं, जब वो मुंबई आई थीं, कई महीनों तक वो आर्थिक तंगी से जूझती रहीं। दोस्तों से, क्रेडिट कार्ड के लोन के भरोसे उन्होंने ज़िन्दगी गुज़ारी… कई शाम बिना कुछ खाए ही सो जातीं थी… पर फिर भी, उनका वो दृढ़ निश्चय था जिस वजह से वो कभी पीछे नहीं हटी। आज लोग उन्हें उनके काम से पहचानते हैं।

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