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धर्म : साल की अंतिम पूर्णिमा आज, खरीदारी होगी मंगलकारी, फिर 16 से खरमास

नवगछिया : आगामी 16 दिसंबर को सूर्य के वृश्चिक से धनु राशि में प्रवेश के साथ ही खरमास शुरू होगा। इस दौरान विवाह समेत सभी मांगलिक कार्य स्थगित रहेंगे, लेकिन कथा, पूजा-प्रवचन और धार्मिक अनुष्ठान जारी रहेंगे। खरमास शुरू होने से पहले इस साल की अंतिम पूर्णिमा 4 दिसंबर को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान दत्तात्रेय का प्रकटोत्सव भी मनाया जाता है । मराठी समाज इसे दत्त जयंती के कारण दूसरी गुरु पूर्णिमा के रूप में भी मानता है। पूर्णिमा के दिन कृतिका और उसके बाद रोहिणी नक्षत्र के साथ सिद्ध व शिव योग का संयोग रहेगा, जो व्यापारिक अनुबंध के लिए अत्यंत शुभ फलदायी है।

खरीद-फरोख्त और पूजा : पूर्णिमा के अलावा 8 दिसंबर (गणेश चतुर्थी) और 15 दिसंबर (सफला एकादशी) भी शुभ दिन माने गए हैं। ज्योतिषी के अनुसार, 4 फरवरी को गुरुवार होने से पूर्णिमा का होना शुभ रहेगा। घरों और मंदिरों में विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा, सत्यनारायण की कथा और दीपदान आयोजित होंगे।

पौष पूर्णिमा और स्नान : पौष माह की अगली पूर्णिमा 2 और 3 जनवरी 2026 को रहेगी, इसी दिन माघ स्नान प्रारंभ होगा और लोग पवित्र नदियों में स्नान-दान पुण्य करेंगे।16 दिसंबर से 14 जनवरी तक खरमास रहेगा। इसके बाद मांगलिक कार्य शुरू होंगे, लेकिन विवाह केवल शुक्र ग्रह के उदित होने के बाद 4 फरवरी 2026 से ही संभव होंगे।

पूर्णिमा पर ये शुभ कार्य : ज्योतिषियों के अनुसार पूर्णिमा के दिन नवीन गृह प्रवेश, नामकरण, नए व्यापारिक अनुबंध और विवाह करना शुभ रहेगा। हालांकि, विवाह मुहूर्त केवल 7 दिसंबर तक ही रहेंगे, क्योंकि 9 दिसंबर को सुबह 7.11 बजे शुक्र ग्रह पूर्व दिशा में अस्त हो जाएगा। शुक्र का उदय 3 फरवरी को होगा। अरावली पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी 1722 मीटर की भूमि पर स्थित दत्त भगवान मंदिर में दत्त जयंती मनाई जाएगी। राजपूत समाज, आबूराज द्वारा प्रतिवर्ष की भांति वार्षिक ध्वजा चढ़ाई जाएगी, जिसके लिए देश के विभिन्न राज्यों से संत-महात्मा और श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं। मंदिर महंत राकेश गिरी ने बताया कि दत्त भगवान की जयंती पर आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए प्रसादी की व्यवस्था की गई है। पर्वत की इस ऊंचाई पर स्थित पवित्र धाम पर हर वर्ष सैकड़ों भक्त दर्शन कर दत्त भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। दत्त भगवान जयंती पर आयोजित वार्षिक ध्वजा रोहण कार्यक्रम राजपूत समाज की आस्था, परंपरा और अध्यात्म का संगम माना जाता है।

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