जमुई:- पाल वंश के प्रतापी शासक इंद्रद्युम्न उर्फ इंद्रपाल की राजधानी इंदपैगढ़ अपने आप में कई रहस्यों को समेटे हुए है। किंवदंतियों के अनुसार यहीं आसपास के जंगलों में इंद्रपाल का बेशकीमती खजाना छिपा है, जिसकी आजतक खोज नहीं की जा सकी है। इतिहासकार भी इस बात से सहमति जताते हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!किंवदंतियों के झरोखे से

इलाके में प्रचलित लोककथा के अनुसार इंद्रपाल की रानी को एक साधु का वरदान था। वह रोज कमल के पत्ते पर पैर रखकर नहाने जाती थी। एक दिन कमल का पत्ता डूब गया। साधु के संकेत के अनुसार उसके बाद राजा इंद्रपाल राजपाट छोड़कर निकल गए। फिर यह खजाना निगोरिया समुदाय के पास चला गया। बाद में दो शासकों के बीच हुए सत्ता संघर्ष के दौरान इस खजाने को गिद्घेश्वर पर्वत के पास कहीं जमीन में गाड़ दिया गया।
गजेटियर में भी उल्लेख
मुंगेर गजेटियर में भी इन बातों का उल्लेख है। इंदपैगढ़ के इस पुरातात्विक स्थल के समीप एक ऊंचा टीला और महल की मोटी दीवार है। इसे कोठरिया कहा जाता है। दंतकथा के अनुसार गढ़ की खोदाई अथवा जमीन पर कब्जा करने वालों को नुकसान उठाना पड़ा है। इंदपै गांव के पंकज मिश्रा भी इन अफवाहों पर सहमति जताते हैं।
पुरातत्व विभाग उदासीन
इंदपैगढ़ के इस महत्वपूर्ण अवशेष ने कई इतिहासकारों व पुराविदों को आकर्षित किया है। 16 मार्च 1811 को इतिहासकार बुकानन, 1871 में कनिंघम और 1872 में बेगलर यहां आए। इतिहासकारों के अनुसार इंद्रपाल इलाके में पाल वंश के अंतिम शासक थे। बुकानन के अनुसार मुस्लिम आतंक से घबराकर इंद्रपाल ने गढ़ छोड़ा था। गढ़ के अंदर या आसपास के किसी इलाके में उन्होंने अपना खजाना छिपा दिया। वर्षों बाद भी यह रहस्य छिपा है।
खोदाई की जरूरत
पुरातत्व विभाग ने कभी भी इस रहस्य को उजागर करने का प्रयास नहीं किया। जमुई के इतिहास पर खोज करने के वाले प्रो. श्यामानंदन प्रसाद ने अपनी किताब में लिखा है कि यहां खोदाई करने पर कई चट्टानों से बंद कोषागार में रखे खजाने का पता चल सकता है। मुस्लिम शासक इस खजाने को लूट नहीं पाए थे।
खोदाई में मिले अवशेष
इंदपैगढ़ की खोदाई में आठवीं शताब्दी की बुद्ध मूर्ति, 12 वीं शताब्दी की काले पत्थर की बटुक भैरव की मूर्ति व विष्णुचरण के अलावा 10 वीं शताब्दी की नागकन्या की मूर्तियां आदि मिली हैं। इन्हें जमुई के चंद्रशेखर सिंह संग्रहालय में संरक्षित कर रखा गया है।

