नवगछिया : 23 साल की उम्र में पाकिस्तानी दुश्मनों को धूल चटाकर कारगिल में तिरंगा लहराया था प्रभाकर

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नवगछिया। रंगरा चौक के मदरौनी निवासी जांबाज प्रभाकर सिंह ने 23 साल की उम्र में पाकिस्तानी दुश्मनों को धूल चटाकर कारगिल में तिरंगा लहराया और देश की रक्षा में अपनी जान कुर्बान कर दी। 11 जुलाई 1999 को ऑपरेशन कारगिल विजय में शहीद हुए वीर योद्धाओं में गनर प्रभाकर सिंह भी थे। जिन्होंने तीन गोलियां लगने के बाद भी दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिये थे।

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प्रभाकर सिंह के शहीद होने पर लोगों को बेटे को खोने का गम और गर्व भी था। जब पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर गांव आया तो इलाके के लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। इसी बीच बहन मधु के साथ-साथ गांव की लड़कियों ने भी शहादत पर अपनी-अपनी ओढ़नी फाड़कर शहीद भाई की कलाई पर पहले राखियां बांधी फिर फुट-फुटकर रोई थी। यह देख शहीद लाल को श्रद्धांजलि देने पहुंची हजारों की भीड़ रोई थी। बीच-बीच में सन्नाटे को चीरती हुई जब तक सूरज चांद रहेगा, प्रभाकर तेरा नाम रहेगा के नारे गूंज रहे थे।

शहादत से युवाओं में जगा देशप्रेम का जज्बा

ग्रामीण रौशन सिंह, सुधांशु सिंह बताते हैं कि वह हमेशा देशभक्ति की ही बातें करता था। उसके मन में बचपन से ही देशभक्ति की भावना थी। सुबह चार बजे ही गांव के युवाओं को मैदान में ले जाकर अभ्यास करवाते थे और सेना में जाने के लिए प्रेरित करते थे। शहादत के बाद युवाओं में देश सेवा की भावना इस कदर परवान चढ़ी कि आज मदरौनी के 50 से अधिक युवक सेना में हैं।

बेटे के लिए मां खोज रही थी बहू

जिस समय प्रभाकर शहीद हुए थे। उस समय उसकी शादी नहीं हुई थी। उसकी मां प्रभाकर की शादी के लिए दुल्हन खोज रही थी। बड़ी बहन मधु के बाद बड़ा भाई दिवाकर और सबसे छोटा था प्रभाकर। लेकिन बेटे के सिर पर सेहरा देखने के बजाय उसकी मां बेटे की अर्थी देखकर फुट-फुटकर रोई थी।

11 जुलाई को शहीद हुए थे प्रभाकर

मदरौनी गांव में 25 जुलाई 1976 को शहीद गनर प्रभाकर सिंह का जन्म हुआ था। उनके पिता परमानंद सिंह के आकस्मिक निधन के बाद उनकी मां शांति देवी ने धैर्य के साथ अपने शिक्षक पति परमानंद सिंह के सपनों को पूरा किया। 1992 में प्रभाकर को मैट्रिक और 1994 में इन्टरमीडिएट करवाया। पैसे की कमी के कारण उनका शुरुआती जीवन हमेशा अभाव में ही बीता। इसी बीच प्रभाकर को मधेपुरा के सहारा इंडिया शाखा में नौकरी मिल गई। लेकिन दिल में देशप्रेम के जज्बे के कारण कुछ दिनों बाद वे सेना में बहाल हो गए। इस कारण उन्होंने सहारा इंडिया की नौकरी छोड़ दी। वे 333 मिसाइल ग्रुप अर्टिलरी सिकन्दराबाद में नियुक्त होकर काम करने लगे। उनके काम और देशप्रेम के जज्बे को देखकर सेना के आलाधिकारियों ने उन्हें 19 अप्रैल 1998 को छठी राष्ट्रीय रायफल बटालियन में प्रतिनियुक्त कर कारगिल भेज दिया। कारगिल में उन्होंने पाकिस्तानी घुसपैठियों से जमकर लोहा लिया। दर्जनों पाकिस्तानी घुसपैठिये को मौत के घाट उतारे। इसी दौरान दुश्मन की गोली उन्हें लगी और वे 11 जुलाई को शहीद हो गए।

बेटे के जाने का गम सह नहीं पायी मां और दुनिया से विदा हो गयी

शहादत के बाद मदरौनी में बना शहीद स्मारक वर्ष 2000 के कोसी नदी के भीषण कटाव में कटकर कोसी में विलीन हो गया। बेटे की अस्थि कलश को सीने से लगाये मां शांति देवी ने मदरौनी गांव को अलविदा किया और सात वर्ष बाद दुनिया छोड़ दिया। कोसी नदी में घर कटने के बाद बड़ा भाई पूर्णिया में रह रहा है।