नवगछिया : भगवान शंकर के मानस पुत्र थे बाबा गणिनाथ. मद्धेशिया समाज के कुलगुरु श्री श्री 1008 संत शिरोमणि बाबा गणिनाथ जी महाराज भगवान शिव के अवतार थे,बाबा गणिनाथ को भगवान शंकर का मानस पुत्र माना जाता है. जिनका अवतार इस भूलोक में धर्म की रक्षा, मानवता का संदेश देने व मानवों के बीच बढ़ रही वैमनस्यता को दूर करने के लिए हुआ था. चतुर्दिक ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु गोरख नाथ जी को गुरु ग्रहण करते हुए उनके सानिध्य में वर्षों तप कर सिद्धियों पर पलवैया की धरती पर अपने गणराज्य की स्थापना किये. भगवान शिव के परम भक्त श्री मंशाराम ग्राम महनार वैशाली में गंगा किनारे अपनी एक कुटिया में सपत्नी रहते थे. मंशाराम जी सात्विक व धार्मिक विचारों को मानने वाले थे.
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!गृहस्थ जीवन के साथ भगवान भोले शंकर के सबसे बड़े उपासक थे. संतानहीन होने के बावजूद उनका भगवान पर पूरा विश्वास था और वे अपने जीवन से खुश थे. इसी विश्वास व मंशाराम की भक्ति से प्रसन्न होकर भोले बाबा ने एक रात दर्शन दिया और अगले ही दिन वन में एक पीपल के पेड़ के नीचे एक अलौकिक बच्चा मिला. इसके अछ्वुत कारनामों ने मंशाराम की जदगी ही बदल दी. बाद में यही बालक राजयोग व महर्षि योग के धनी होने के कारण आगे चलकर गणिनाथ हुए. चंदेल राजाओं में महाराजा धंग की पुत्री क्षेमा से विवाह के बाद गणिनाथ ने अपने पराक्रम से उनके राजपाट को और बढ़ा दिया.

बाद में महाराजा धंग ने गणिनाथ का राज्याभिषेक कर दिया. इस बीच महमूद गजनी की क्रूरता की चर्चा सुनते ही गणिनाथ ने अपने प्रतापी पुत्र विद्याधर संग गजनी को देश से खदेड़ दिया. इस बीच पलवैया में यवनों के अत्याचार की सूचना मिली। इससे निपटने के लिए भयंकर युद्ध हुआ. युद्ध में हार के बाद यवनों की सेना भी बाबा गणिनाथ जी महाराज के तपबल व योगशक्ति से इतना प्रभावित हुए कि शरणागत हो गए.
इसके बाद अपने बेटे विद्याधर को राजपाट की जिम्मेवारी सौंप गणिनाथ सन्यासी वेश में खजुराहो की तरफ चले गए. वे खजुराहो से चित्रकुट, प्रयाग, अयोध्या व गोविन्दधाम तक की यात्रा पूरी की व देश के कई हिस्सों में जाकर लोगों को योग, साधना, मानवसेवा व शिक्षा के प्रति जागरूक किए. विक्रम संवत 1112 आश्विन मास के नवरात्रि के अवसर पर आयोजित श्री राम जन्मोत्सव को सम्बोधन के उपरांत उन्होंने अपना शरीर त्याग किया
