नवगछिया : 20 से 22 अक्टूबर तक भव्य आयोजन.. रात में भव्य देवी जागरण

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सवा दो सौ साल पुराना सिद्ध स्थल, जहां बच्चों के खेल से शुरू हुई मां की आराधना

नवगछिया (रंगरा प्रखंड): नवगछिया अनुमंडल के सुप्रसिद्ध धर्मस्थलों में से एक भवानीपुर स्थित मां दक्षिणेश्वरी काली मंदिर का इतिहास आज से करीब सवा दो सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि लोकविश्वास और परंपरा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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बच्चों के खेल से शुरू हुई मां काली की पूजा

मंदिर के अध्यक्ष विश्वास झा बताते हैं कि लगभग 225 वर्ष पूर्व भवानीपुर गांव के सोनरा बहियार में बच्चों ने खेल-खेल में मिट्टी से मां काली की प्रतिमा बना दी थी। खेल के दौरान उन्होंने गांव से एक पाठा (बकरा) पकड़ लाया और उत्साह में “जय मां काली” के जयकारे लगाते हुए कुश घास से उसकी गर्दन पर हल्का वार कर दिया।

कहते हैं कि जैसे ही बच्चों ने कुश चलाई, पाठे की गर्दन सचमुच कट गई और वह बलि चढ़ गया। यह देखकर सभी बच्चे भयभीत होकर अपने-अपने घर भाग गए।

गांव के बुजुर्गों के सुझाव पर बच्चों ने मिट्टी की प्रतिमा को गंगा जल में विसर्जित कर दिया।


भूसी पोद्दार को स्वप्न में दर्शन

कथा के अनुसार, उसी रात गांव के भूसी पोद्दार को मां काली ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि “मुझे जल से निकालो और स्थापित करो।”
अगले ही दिन ग्रामीणों की मदद से भूसी पोद्दार ने गंगा से प्रतिमा निकालकर उसे गांव में स्थापित कर दिया।

तब से बालमुकुंद पोद्दार परिवार के वंशजों द्वारा मंदिर में पूजा-अर्चना का कार्य प्रारंभ हुआ। जब परिवार मंदिर संचालन में असमर्थ हुआ, तो ग्रामीणों ने मिलकर सार्वजनिक मंदिर का निर्माण कराया।

आज भी परंपरा के अनुसार, नैन और बलि देने की प्रथम पद्धति भूसी पोद्दार के घर से ही प्रारंभ होती है। नैन चढ़ते ही उसी रात मां को बलि दी जाती है। हर वर्ष यहां हजारों पाठों और भैंसों की बलि दी जाती है।


श्रद्धालुओं की अटूट आस्था

भवानीपुर काली मंदिर में मां की आराधना इतनी प्रसिद्ध है कि आसपास के कई जिलों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
मां से मुराद पूरी होने पर भक्त सोने और चांदी के आभूषण चढ़ाते हैं। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।


20 से 22 अक्टूबर तक भव्य आयोजन

इस वर्ष मंदिर परिसर में तीन दिवसीय विशेष कार्यक्रम आयोजित होंगे —

  • 20 अक्टूबर: मां काली की प्रतिमा स्थापित की जाएगी।

  • 21 अक्टूबर: दिनभर मेला, रात में भव्य देवी जागरण का आयोजन।

  • 22 अक्टूबर: संध्या 5 बजे महाआरती और रात्रि 7 बजे प्रतिमा परिभ्रमण एवं विसर्जन विदाई

हर वर्ष की तरह इस बार भी हजारों श्रद्धालुओं के आने की संभावना है।


नई पीढ़ी के हाथों में जिम्मेदारी

लगातार सात वर्षों से व्यवस्थापक रहे प्रशांत कुमार उर्फ पिंटू यादव के साथ इस बार सबसे कम उम्र के अध्यक्ष विश्वास झा को मंदिर समिति की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
विश्वास झा पहली बार इस पद पर चुने गए हैं और मेले की संपूर्ण व्यवस्था उन्हीं की देखरेख में की जा रही है।


जल्द बनेगा करोड़ों की लागत से नया भव्य मंदिर

ग्रामीणों के अनुसार, अध्यक्ष विश्वास झा और व्यवस्थापक प्रशांत यादव — दोनों युवा, ऊर्जावान और दूरदर्शी हैं। दोनों ने मिलकर मंदिर के नव-निर्माण की योजना तैयार की है।

प्रशांत कुमार ने बताया कि —

“मां की कृपा से जल्द ही करोड़ों रुपये की लागत से एक नव भव्य मंदिर का निर्माण कार्य शुरू होगा। ऐसा मंदिर बनेगा, जिसे देखकर लोग अचंभित रह जाएंगे।”

ग्रामीणों ने भी इस संकल्प का स्वागत किया है और निर्माण कार्य में सहयोग का भरोसा दिया है।


आस्था का केंद्र और लोकविश्वास का प्रतीक

भवानीपुर काली मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह लोककथा, श्रद्धा और तंत्र साधना का अनोखा संगम स्थल है।
यहां की परंपराएं, बलि विधान, और स्वप्न दर्शन की कथा इसे एक जीवंत आस्था केंद्र बनाती हैं — जहां मां दक्षिणेश्वरी काली की शक्ति आज भी साक्षात् अनुभव की जाती है।