नवगछिया : खगड़ा के आयुर्वेद अस्पताल में 20 साल से लटका है ताला, खंडहर बना परिसर

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एक तरफ जहां कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रसार के चलते अस्पताल और स्वास्थ्य केन्द्रों की मांग बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ पहले से बने अस्पताल सरकारी उदासीनता के चलते धूल फांक रहे है। ऐसा ही एक अस्पताल नवगछिया प्रखंड में भी है। प्रखंड के खगड़ा गांव स्थित आयुर्वेद चिकित्सालय में 20 साल से ताला लटका हुआ है। अस्पताल का भवन और परिसर अब खंडहर में तब्दील हो गया है। परिसर में झाडिय़ां उग गई हैं। एक समय था जब यहां चिकित्सक, कंपाउंडर, ड्रेसर व एक चतुर्थवर्गीय कर्मी पदस्थापित थे। उस दौरान इस अस्पताल में इलाके के 50 से अधिक गांवों के मरीजों के असाध्य रोगों का इलाज होता था।

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यहां टीबी, दम्मा, लकवा जैसे रोगों का इलाज किया जाता था। अस्पताल में पर्याप्त दवाई उपलब्ध रहती थी। लेकिन आयुर्वेद चिकित्सा के प्रति सरकार की उदासीनता के कारण धीरे-धीरे प्रतिनियुक्त चिकित्सक व कर्मों सेवानिवृत्त होते गए और उनकी जगह पर किसी की पोस्टिंग नहीं हुई। अंत: अस्पताल बंद हो गया। यहां के लोगों की माने तो 1995 तक अस्पताल बेहतर तरीके से संचालित रहा। इसके बाद चिकित्सक व कमी सेवानिवृत्त होते गए। लोगों का कहना हैं कि अगर अस्पताल चालू होता है तो उन्हें सुविधा होगी।

स्वास्थ्य विभाग व प्रशासन से अस्पताल को चालू करवाने की मांग की है। 1954 में खगड़ा में आयुर्वेद अस्पताल की स्थापना की गई थी। गांव के विदेश्वरी प्रसाद सिंह ने 22 कड्डा जमीन दान देकर अस्पताल खुलवाया था। अंशु आनंद बताते हैं कि उनके पर दादा विदेश्वरी प्रसाद सिंह ने अपने छोटे पुत्र बैकुंठ प्रसाद सिंह की टीबी से मौत होने के बाद अस्पताल की स्थापना के लिए पहल की। बैकुंठ प्रसाद सिंह अंग्रेज सरकार में अफसर थे। सही तरीके से इलाज नहीं होने के कारण उनकी जान चली गई थी।

इसके बाद विदेश्वरी सिंह ने 22 कट्टा जमीन दान में दिया और आयुर्वेद अस्पताल खुलवाया। उन्होंने कहा कि यह अस्पताल इलाके के लिए धरोहर है। बिक्रमशिला पुल पहुंच पथ और 14 नंबर सड़क के बीच स्थित इस अस्पताल को सरकार अगर पुनः चालू कर दे तो इलाके के लोगों को इसका काफी लाभ मिलेगा।