कई किसान खुद मंडियों तक पहुंचा रहे हैं लीची
देसी प्रजाति में थोड़ी सी है खटास लेकिन चढ़ गई है लाली

नवगछिया में मुख्यता दो प्रकार की लीची की पैदावार होती है. पहली प्रजाति देसी लीची की प्रजाति है जबकि दूसरी प्रजाति मनराजी लीची की है. मनराजी लिची को तैयार होने में अभी कम से कम 10 दिनों का समय है. दूसरी तरफ देसी लीची पर पूरी तरह से लाली चढ़ गई है. हालांकि अभी देसी लीची में थोड़ी सी खटास है लेकिन फिर भी देश के विभिन्न मंडियों में यहां के लीची की मांग अभी से ही जोर पकड़ने लगा है. सोमवार को देर शाम बारिश के बाद देसी मिर्ची की खटास में कमी आने और दाने के और पुष्ट होने के कयास किसान लगा रहे हैं. नवगछिया के स्थानीय बाजारों में देसी लीची का वर्तमान भाव 80 रुपया प्रति सैकड़ा है. नवगछिया जीरोमाइल, बस स्टैंड, बिहपुर के झंडापुर इमली चौक, बिहपुर का गोल बाजार, नारायणपुर के मधुरापुर बाजार स्थित सब्जी मंडी, रंगरा चौक पर लीची मिलना शुरू हो गया है. लोग खुद बागानों तक जाकर भी लीची की खरीद कर रहे हैं.
देवघर मंडी पहुंच रही है पकरा के बागानों की लीची
वर्तमान में नवगछिया के पकरा गांव के लीची बागानों से अधिकांश लीची झारखंड के देवघर शहर के मंडियों में पहुंच रही है. यहां के किसान खुद लीची को पैकेजिंग कर देवघर के मंडियों में भेज रहे हैं. बकरा दुनिया टोला के किसान बबलू सिंह ने कहा कि वह लोग अपने से भाड़े पर वाहन लेकर लीची की पैकेजिंग कर देवघर मंडियों तक भेज रहे हैं. लीची में थोड़ी खटास होने के बावजूद भी मंडियों तक पहुंचते ही लीची के खरीददार उसे खरीद लेते हैं. किसान बबलू सिंह ने कहा कि अपने से लिखी को मंडी तक भेजना थोड़ा जोखिम भरा काम होता है लेकिन इस तरह से लीची की बिक्री करने में ज्यादा मुनाफा होता है. यही कारण है कि बकरा गांव के अधिकांश किसान खुद लीची की पैकेजिंग कर लीची को मंडियों तक पहुंचा रहे हैं.
इधर खरीक और बिहपुर में पहुंच रहे हैं बंगाल के व्यवसाई
नवगछिया अनुमंडल के बिहपुर और खरीक प्रखंडों में बड़े पैमाने पर लीची की पैदावार की जाती है. विगत 10 दिनों से बंगाल के कई व्यवसाई लीची किसानों के बागान तक पहुंच रहे हैं. तेलगी गांव पहुंचे बंगाल मालदह जिला के व्यवसाई देवोजीत ने बताया कि वे हर वर्ष अपनी पूरी टीम के साथ करीब डेढ़ माह का समय नवगछिया इलाके में ही गुजारते हैं. वह यहां के किसानों के बागानों से लिखी खरीदकर बंगाल के मंडियों तक भेजते हैं फिर मंडियों से लीची देश के अन्य शहरों के विभिन्न मंडियों में पहुंचाया जाता है. यहां की लीची विदेशों में भी निर्यात किए जाते हैं. जानकारी के अनुसार खरीक के तेलघी, ध्रुबगंज, तुलसीपुर, कठैला, बिहपुर के मिल्की, झंडापुर, दयालपुर, जयरामपुर, मड़वा, अमरपुर, लत्तीपुर, सोनवर्षा, नवगछिया के जमुनिया, तेतरी आदि गांवों के लीची बागानों तक बंगाल के व्यवसाई पहुंच रहे हैं.
दैनिक मजदूरों को भी हो रही है अच्छी कमाई
लीची और आम के सीजन में दैनिक मजदूरों को भी अच्छी कमाई होती है. अधिकांश दैनिक मजदूर अपने परंपरागत कार्य को छोड़ कर लीची बगान पहुंचते हैं और लीची को तोड़ने और उसके गुच्छे को गिनती के साथ बनाने का काम करते हैं. इस काम में अधिक से अधिक संख्या में महिला मजदूरों को भी काम मिलता है. खासकर लीची के गुच्छे बनाने और उसे गिनती करने का काम महिलाएं करती हैं. इस कार्य में बिहारी मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से दोगुना मजदूरी मिलती है. यही कारण है कि इलाके में इन दिनों अन्य कार्य के लिए दिहारी मजदूर नहीं मिल रहे हैं.
