पटना। एक मशहूर ऐड है ‘दाग अच्छे हैं’। फिलहाल बिहार की राजनीति में भी कुछ ऐसा ही नजर आ रहा है। जिस प्रकार से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रातो-रात संगीत सोम फेमस हो गए थे। ठीक वैसा ही कुछ अर्जित शाश्वत भी करना चाहते हैं, लेकिन नीतीश ऐसा होने नहीं देंगे।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!दरअसल, बिहार में जब महागठबंधन की सरकार बनी तो सहयोगी पार्टी आरजेडी के मुखिया लालू यादव और उनके परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर नीतीश कुमार घिरते रहे। नैतिकता की दुहाई देकर बीजेपी कार्रवाई की मांग करती रही। तत्कालीन उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को लेकर नीतीश कुमार कई बार असहज नजर आए। किसी तरह 18 महीने तक महागठबंधन की सरकार चलाने के बाद नीतीश कुमार गठबंधन तोड़ दिया और बीजेपी के साथ मिलकर जुलाई 2017 में सरकार बनाई।
दरअसल, जून 2017 में नीतीश कुमार ‘तेजस्वी संकट’ से जूझ रहे थे। अपनी छवि को बचाने के लिए नीतीश पहले तो महीनों तक खामोश रहे। जब चुप्पी टूटी तो महागठबंधन से अलग होने का फैसला ले लिया। जुलाई 2017 में महागठबंधन अलग हुए नीतीश कुमार का बीजेपी के साथ आए एक साल भी नहीं हुआ है कि वे फिर से संकट में फंस गए हैं। विपक्ष का नीतीश पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है, वे लोग अर्जित की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं। लेकिन नीतीश अब तक इस मुद्दे पर खामोश हैं।

खामोशी की वजह भी है। अर्जित के बचाव में दो-दो केंद्रीय मंत्री हैं। अर्जित के पिता केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के कद्दावर नेता हैं। शायद इसी कारण बीजेपी भी खुलकर नहीं बोल रही है। अर्जित भी खुलेआम बिहार सरकार को चुनौती दे रहे हैं। गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद भी पुलिस अभी तक अर्जित को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। जिसे लेकर विपक्ष, खासकर तेजस्वी यादव सदन और सदन के बाहर नीतीश कुमार पर निशाना साध रहे हैं।
इसका कारण भी है। जब नीतीश महागठबंधन के साथ सरकार चला रहे थे तो छिटपुट घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो बिहार में लगातार इतने जगहों पर दंगा नहीं हुआ था। साथ ही जिस तरह अश्विनी चौबे और गिरिराज सिंह बयान दे रहे हैं उससे नीतीश कुमार असहज दिख रहे हैं। इसकी बानगी रामनवमी के दिन पटना के डाकबंगला चौरहे पर भी देखने को मिला, जब नीतीश गिरिराज के जाने के बाद ही मंच पर आए।
इससे पहले ही नीतीश कुमार ने राज्य में बढ़ते सांप्रदायिक घटनाओं को लेकर स्पष्ट कर दिया था कि उससे वे कोई समझौता नहीं करेंगे। इसके बावजूद बिहार के औरंगाबाद में सांप्रदायिक हिंसा हुई। 10 जिलों में सांप्रदायिक तनाव है। साथ ही बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता लगातार भड़काऊ बयान दे रहे हैं। ऐसे में नीतीश के सामने अब तक का ये सबसे बड़ा संकट हैं।
इधर, सियासी पंडितों का मानना है कि नीतीश कुमार बेहद ही सुलझे हुए राजनीतिज्ञ हैं और वे सही वक्त पर इस संकट से निपट लेंगे। वहीं, कुछ पंडितों का यह भी मानना है कि नीतीश कुमार बिगड़े हुए माहौल में अर्जित की गिरफ्तारी करवाकर उसका कद नहीं बढ़ाना चाहते हैं, जैसे यूपी के मुजफ्फरनगर हादसे के बाद संगीत सोम का कद बढ़ा था।
