भागलपुर। देवोत्थान एकादशी पर्व को लेकर श्रद्धा और भक्ति का माहौल है। शनिवार शाम को घर-घर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाएगी। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और चार महीने के चातुर्मास के बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन जाग्रत होते हैं। इस दौरान विवाह और अन्य मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!ज्योतिषाचार्य पंडित सुभाष पाण्डेय ने बताया कि इस वर्ष देवोत्थान एकादशी 1 नवंबर (शनिवार) को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु के जागरण के साथ ही सभी शुभ और मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत होगी।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2025 में काशी और मिथिला पंचांग के अनुसार विवाह के लिए मात्र 14 शुभ तिथियां हैं।

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नवंबर में: 21, 22, 23, 25, 26, 28, 29 और 30
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दिसंबर में: 4, 5, 9, 10, 14 और 15
वहीं द्रिक पंचांग (पश्चिमी भारत में प्रचलित) के अनुसार विवाह के मुहूर्त 2, 3, 8, 12, 13, 16, 17 और 18 दिसंबर को भी रहेंगे।
पूजा-विधि और परंपरा:
देवोत्थान एकादशी को घर के आंगन में चावल पीसकर चौक बनाया जाता है, जिसमें घर, भंडार, हल, चौंकी, सीकर, खड़ाऊं, पैर और मवेशियों के चित्र अंकित किए जाते हैं। भंडारघर में 12 खाने बनाकर उन्हें बारह प्रकार के अन्न से भरा जाता है। रात में चौक पर ईख खड़ा किया जाता है।
पूजा में नया गुड़, सुथनी, कन्ना या कच्चू, शकरकंद, दूध-दही और फल से शालिग्राम भगवान की पूजा की जाती है। इसी दिन भगवान शालिग्राम और माता तुलसी का विवाह हुआ था, इसलिए इसे हरिप्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है।
मान्यता है कि जो दंपति संतानहीन हैं, वे तुलसी विवाह कर कन्यादान का पुण्य प्राप्त करते हैं। दिनभर उपवास के बाद रात्रि में भगवान शालिग्राम की पूजा कर “देव जागरण” संपन्न किया जाता है। पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व बताया गया है।
