नवगछिया : वट सावित्री व्रत को लेकर सुहागिन महिलाओं ने बुधवार को निर्जला उपवास रखा। इस बार अमावस्या गुरुवार को है। सुहागिनें फल-पकवान से डलिया भरकर गुरुवार को बरगद की पूजा करेंगी। व्रत को लेकर बाजार में फल-पकवान, बांस के पंखे, डलिया की खरीदारी आदि के लिए बुधवार देर शाम तक भीड़ लगी रही। पति की दीर्घायु की कामना के लिए महिलाएं वट सावित्री व्रत करती हैं। सावित्री ने वटवृक्ष की पूजा और व्रत करके ही अपने सतीत्व और तप के बल से अपने मृत पति सत्यवान को यमराज से जीतकर पुनः जीवित कराया था। यही कारण है कि इस व्रत का नाम वट सावित्री पड़ा।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!वट सावित्री व्रत के एक दिन पूर्व महिलाएं नये कपड़े पहन सोलहों शृंगार करती हैं। हाथ में मेहंदी रचाती हैं। उपवास कर महिलाएं पांच तरह के फल-पकवान आदि से डलिया भरती हैं। सुबह दूसरे दिन वट वृक्ष के समक्ष डलिया खोलकर बांस के पंखे पर पकवान आदि रखकर सावित्री और सत्यवान की कथा कही और सुनी जाती है। व्रत की खरीदारी के लिए शहर के लोहिया पुल के नीचे, मिरजानहाट, आदमपुर, बूढ़ानाथ चौक, तिलकामांझी सहित अन्य जगहों पर डलिया, पंखे की बिक्री देर शाम तक हुई। चरकोनी डलिया और बांस के पंखे की बिक्री 60 रुपए में हुई। आम 80 से 100 रुपये किलो, नारियल 30 रुपए पीस, केला 50 रुपए दर्जन, लीची 200 रुपये सैकड़ा की दर से बिका।
पहले वटवृक्ष को पंखा झेलने की रही है परंपरा
पंडित दयानंद पाण्डेय के अनुसार वट सावित्री की पूजा के समय महिलाएं बाल में बरगद के पत्ते लगाती हैं। बांस पंखा में भी लाल धागा बांधकर पूजा करने के बाद वटवृक्ष को ही पहले पंखा झेलने की परंपरा रही है। इसके बाद बाद पति को पंखा झेलती हैं। नवविवाहिताएं अपने घर से सज-धजकर माथे पर जल भरा कलश लेकर पूजन स्थल तक जाती हैं। इस दौरान परिवार एवं अन्य महिलाएं उसके साथ पारंपरिक गीत गाती हुई वट वृक्ष के समीप पहुंच पूजा करती हैं। पहली बार पूजा करने वाली महिलाएं को बांस के 14 पंखे पूजा में रखना पड़ता है। महिलाओं का महत्वपूर्ण पर्व होने से इस व्रत का महिलाओं को बेसब्री से इंतजार रहता है।

