1989 के में हुए सांप्रदायिक हिंसा के बाद से पूरा भागलपुर सिल्क के बुनकर भुखमरी की जिंदगी जी रहे

भागलपुर / पटना

भागलपुर शहर पूरे देश में अपने उत्कृष्ट रेशम के कपड़ों के लिए मशहूर है. लेकिन रेशम बनाने वाले बुनकर अब अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. यहां के बुनकरों की स्थिति अब इतनी बदतर हो चुकी है कि वे भुखमरी की जिंदगी जी रहे हैं.

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बाबरी मस्जिद प्रकरण के दौरान पूरे देश में फैले सांप्रदायिक हिंसा का सर्वाधिक शिकार भागलपुर हुआ. साल1989 के में हुए सांप्रदायिक हिंसा के बाद से पूरा रेशम उद्योग ऐसा चरमराया कि फिर से उबर ना सका. इसके बाद आपसी सद्भाव की नींव इतनी कमजोर हो गयी कि भय से मुस्लिम मालिकों के यहां हिन्दू मजदूरों ने काम करना बंद कर दिया. चूंकि रेशम के काम में लगे अधिकांश मालिक मुस्लिम समुदाय से आते थे इसलिए उनका धंधा भी चौपट होने लगा.

इस घटना के लगभग तीन दशक होने को हैं मगर अब तक शहर इससे उबर नहीं पाया है. हालांकि इसी बीच सरकार ने क्लस्टर योजना के तहत बुनकरों के लिए शेड बनवाने की व्यवस्था की थी, ताकि भागलपुर का रेशम अपने उसी अंदाज में अपने अस्तित्व को बरकरार रख पाए. लेकिन बुनकरों को बुनने के लिए न तो रेशम के धागे मिले और ना ही सरकार से अन्य कोई बुनियादी व्यवस्था मिल पायी.

बुनकरों ने किया दूसरे शहरों का रूख

इसके अलावा सरकार ने बुनकरों की जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए बुनकर क्रेडिट कार्ड जैसी योजना की शुरुआत की. लेकिन यह योजना भी सफल नहीं हो सकी. अब अधिकांश बुनकरों ने अपने पारंपरिक पेशा को छोड़कर अलग-अलग शहरों का रूख कर लिया है. कई बुनकर यही शहर में मजदूरी के कामों में लग गए हैं.

गोविंदपुर के बुनकर रघुदास ने बताया कि हमारे पास फिलहाल कोई काम नहीं है. किसी प्रकार से हम अपना घर चला पा रहे हैं. हमारे पास भूखे मरने की नौबत आ चुकी है. अन्य बुनकर लक्ष्मी कांत दास ने बताया कि हमें दूसरे समुदाय वाले काम पर नहीं रखते और हमें भी वहां काम करने में डर लगता है. हमने सरकार से कई बार रोजगार देने की मांग की है मगर अब तक सरकार हमारी कोई मदद नहीं कर पायी है.