नवगछिया : मैं बहियार स्थित एक जंगल में हूं, मैं वामकाली हूं। मुझे अपने गांव में.. मंदिर इलाके में सिद्धीपीठ

EVENT

प्रखंड के रामगढ़ स्थित मां वामकाली की मंदिर का इतिहास पुराना है। यह मंदिर इलाके में सिद्धीपीठ के रूप में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की मुरादें पूरी होती हैं। गांव के लोग मां को अपने गृह देवी के रूप में पूजते हैं। शादी-विवाद समेत अन्य कोई शुभ कार्य करने से पहले मैया के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। कहा जाता है मैया की कृपा से गाँव समेत आसपास के गांवों में कभी किसी प्रकार की महामारी जैसी स्थिति नहीं होती है। इस मंदिर में हर वर्ष काली पूजा पर मां की प्रतिमा बैठाई जाती है। वहीं मंदिर परिसर में मेला भी लगता है। यहां बलि देने की प्रथा नहीं हैं। मैया को चढ़ावा के रूप में सिर्फ खप्पर चढ़ाया जाती है।

Whatsapp group Join

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

काली पूजा पर दस हजार से अधिक खप्पर चढ़ाते हैं भक्त

काली पूजा के अवसर पर यहां हर वर्ष मैया के दरबार में दस हजार से अधिक भक्तों द्वारा खप्पर चढ़ाया जाता है। यह खप्पर भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर चढ़ाते हैं। यहां कटिहार से लेकर बेगूसराय तक के लोग खप्पर चढ़ाने आते हैं। जिसके कारण पूजा-अर्चना के दौरान मंदिर परिसर में लोगों कि इतनी भीड़ उमड़ जाती है कि तिल रखने का भी जगह नहीं रह जाता है।

खरीक प्रखंड के रामगढ़ स्थित मां वामकाली का मंदिर।

मुनि बाबा ने नीम के पेड़ के नीचे शुरू की थी पूजा बुजुर्गों का कहना है कि पांच सौ वर्ष पहले मुनि बाबा ने नीम पेड़ के नीचे पिंडी की स्थापना की थी। अब यहां मां का भव्य मंदिर है। जो इलाके में आकर्षक का केंद्र है। मंदिर के पुजारी सुभाष ठाकुर बताते हैं कि गांव के मुनि बाबू मिश्र को स्वप्न में मां ने कहा कि मैं बहियार स्थित एक जंगल में हूं। मैं वामकाली हूं। मुझे अपने गांव में स्थापित करो। इसके बाद मुनि बाबा ने मैया के पिंडी को यहां स्थापित किया। मुनि बाबू के निधन के बाद उनकी पुत्रवधू सेवक बनीं। आज भी उनके वंशज द्वारा ही मैया की पूजा-अर्चना कराई जाती है। इसमें ग्रामीण सहयोग करते हैं।