बिहार की परंपरा है, जो आए उसे अपना बना लो। उसे आश्रय के साथ-साथ सम्मान के साथ भोजन भी दो। उसी परंपरा को वन विभाग बढ़ा रहा है। हर साल की तरह इस बार भी विदेशी मेहमान नवगछिया पहुंचे हैं। जगतपुर झील, जो दुर्लभ पक्षियों का बसेरा है। वहां इनकी चहचहाहट सुनाई देने लगी है। सबसे खास मेहमान है अफ्रीकी चातक (जैकोबिन कूको)। हां, वही चातक जिसके बारे में कहा जाता है कि ये सिर्फ स्वाति नक्षत्र में बरसात की बूंदों से अपनी प्यास बुझाता है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!वही चातक (पपीहा), जिसका वर्णन कबीरदास जी के बीजक ग्रन्थ में किया गया है “चातक सुतहि पढ़ावहिं, आन नीर मत लेई। मम कुल यही सुभाष है, स्वाति बूंद चित देई॥” मुहम्मद जायसी ने नागमती वियोग में और गोस्वामी तुलसीदास एवं राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचनाओं में चातक का वर्णन किया है। अब यही पक्षी हमारे भागलपुर प्रवास पर है। स्थानीय गाइड बताते हैं कि अफ्रीकी चातक हर वर्ष नवगछिया प्रजनन के लिए आते हैं। बारिश के समय ये यहां ठहरते हैं और फिर हजारों किमी की यात्रा पूरा कर वापस लौट जाते हैं।


जगतपुर झील में विदेशी मेहमान
भागलपुर से नवगछिया जाने के क्रम में रंग-बिरंगे पक्षियों का अद्भुत कलरव विक्रमशिला सेतु पार करते ही 16 किलोमीटर की दूरी पर बाईं ओर झील के बड़े भू-भाग में देखने को मिल जाएगा। बरसात के दिनों में गंगा नदी जगतपुर झील तक फैल जाती है। इस दौरान पक्षियों की अद्भुत जलक्रीड़ा देखी जा सकती है। झील में गंगा का पानी आने से जहां एक ओर मछुआरों को लिए मछली पालन में सहूलियत मिलती है, तो वहीं पक्षियों के लिए आहार-विहार की। मछुआरों और किसानों का पक्षियों से दोस्ताना संबंध भी बन जाता है। दोस्ती ऐसी कि ये पक्षी किसानों की फसलों की रक्षा कीट, चूहे आदि से करते हैं।
हर साल यहां ग्रे हेडेड लैपविंग ( सिलेटी सर टिटहरी), रेड शैंक सूरमा (चौबाहा) , मालगुझा, वुड सैंडपाइपर (भूरा चौबाहा), और कूट (सरार) और प्रवासी बतख की प्रजाति के गार्गनी (चैता) आसानी से देखे जा सकते हैं। इसके अलावा कॉटन टील यानी गिर्री, जो कि हमारे देश में प्रजनन करने वाली बतख की प्रजाति है, की सौ की संख्या में देखी जाती हैं।
