बिहार के इस विश्वविद्यालय में रखी लैला-मजनू की असली किताब…

मोहब्बत के सबसे बड़े उदाहरण ‘लैला-मजनू’ की दास्तां बयां करने वाली असली किताब देश की सातवीं पुरानी पटना यूनिवर्सिटी में सुरक्षित और संरक्षित है। यह पांडुलिपि में है। माना जाता है कि यहां रखी लैला-मजनू की पांडुलिपि 17वीं सदी की है।

पटना यूनिवर्सिटी पिछले 100 सालों से राज्य में शिक्षा का केंद्र रही है। यहां तमाम विषयों की पढ़ाई और शोध होते हैं। ढेरों गौरवशाली पल इस विश्वविद्यालय के साथ जुड़े हुए हैं। उसके अलावा भी यहां कई प्रसिद्ध प्राचीन पांडुलिपियां हैं। ये यहां सेंट्रल लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं। 2 लाख 75 हजार पुस्तकें और करीब चार हजार पांडुलिपियां लाइब्रेरी में मौजूद हैं।

14वीं सदी की किताबें
सेंट्रल लाइब्रेरी में लैला-मजनू से भी अधिक पुरानी किताबों का संग्रह है। यहां 14वीं सदी की ‘सरोज कलिका’ और ‘मालती माधवन’, 15वीं सदी की ‘तोलीनामा’ और ‘रिसाला सिफत जरूरिया’, 16वीं सदी की ‘जहांगीरनामा’, ‘वृहद जातक’ और ‘खतमाये फरहांशे जहांगीरी’ तथा 17वीं सदी की ‘मसनवी सीन खुसरो’ की दुर्लभ पांडुलिपियां भी सुरक्षित हैं। इस लाइब्रेरी में मैथिली, बांग्ला, तिब्बती, ब्रजभाषा, तमिल, उडिय़ा, संस्कृत, हिंदी, नेपाली, अरबी, फारसी और उर्दू में लिखीं पांडुलिपियां मौजूद हैं।

चमड़े पर लेखन का गवाह
पुस्तकालय में रखीं पुरानी किताबें सभ्यता के विकास को दर्शाती हैं। पढऩे-लिखने की भूख इंसानों में कायम है। इसने इसे सबसे अनूठा जीव बना दिया। यहां की किताबें दिखाती हैं कि जब तकनीक बहुत विकसित नहीं थी, तब चमड़े, लकड़ी आदि पर लेखन होता था। यहां ताड़ पत्र, पशु चर्म, लकड़ी आदि की पांडुलिपियां भी मौजूद हैं।
आधुनिक पुस्तकों का भी समृद्ध भंडार
98 साल पुराने हो चुके इस पुस्तकालय में आधुनिक युग की किताबें भी खूब हैं। समाज विज्ञान, वाणिज्य, मानविकी, विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा सहित तमाम विषयों की किताबों का संग्रह यहां मौजूद है। जीर्णोद्धार के लिए इस लाइब्रेरी को लंबे समय तक बंद रखे जाने के बाद हाल ही में राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने इसका पुनरोद्घाटन किया है।

अब यहां कंप्यूटर और इंटरनेट सुविधा के साथ वाचनालय का भी निर्माण किया गया है। सेंट्रल लाइब्रेरी की स्थापना 1919 में हुई थी, लेकिन अब यह जिस भवन में है वह 1965 में बना था।

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