लौट रहे हैं वही पुराने दिन : शादी में नागिन डांस, मास्क नाक पर नहीं गर्दन पर लटकते हैं

बीते दिनों चेन्नई में हुए मैच के दौरान स्टेडियम में क्रिकेटरों के अलावा दर्शक भी बैठे दिखे। लगा जैसा प्रागैतिहासिक काल का कोई दृश्य चल रहा हो। अति प्राचीन जमाने की याद आ गई, जब स्टेडियमों में दर्शक होते थे। कुछ समय पहले आइपीएल टूर्नामेंट हुआ था। उसमें खिलाड़ी होते थे और उनके साथ पान मसाला से लेकर सीमेंट वगैरह के इश्तिहार होते थे। भावना से कर्तव्य महान होता है.. की तर्ज पर कहा जा सकता है कि खिलाड़ी से स्पांसर महान होता है।

क्रिकेट में वंशवाद

बर्फी की दुकान को बाप सेट कर के निकल ले तो बेटे के पास भी पुराने ग्राहक आना चालू रखते हैं। क्रिकेट में ऐसा नहीं है। बाप चाहे जो कर गया हो, बेटे को खुद कुछ कर दिखाना होता है। आजकल सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर के साथ यही हो रहा है। क्रिकेट में वंशवाद क्यों नहीं है? वंशवाद में समानता होनी चाहिए। पॉलिटिक्स में है, तो क्रिकेट में भी होना चाहिए। फिर टॉप क्रिकेटरों के पुत्र कप्तान होते और अब के टॉप क्रिकेटर पानी पिला रहे होते।

पुराने दिन लौट रहे हैं: कोरोना जा रहा, अब लोग मास्क को नाक पर नहीं गर्दन पर लटकाते हैं

खैर कोरोना जाता हुआ सा दिख रहा है। क्रिकेट के मैदान में खिलाड़ियों और पान मसाले के साथ दर्शक भी दिख रहे हैं। अहा, पुराने दिन लौट रहे हैं। कोरोना जाता सा इसलिए दिख रहा है, क्योंकि अब लोग मास्क को नाक पर नहीं गर्दन पर लटकायमान अवस्था में रख रहे हैं। यद्यपि हार्वर्ड विश्वविद्यालय या वाट्सएप विश्वविद्यालय ने भी अभी किसी शोध में यह नहीं बताया कि कोरोना अब नाक से नहीं, बल्कि गर्दन से शरीर में प्रवेश करता है। लोग लापरवाह हो रहे हैं। सड़कों पर नालियों के ऊपर गोलगप्पों की रेहड़ियां फुलटू रौनकवान होने लगी हैं। हालात इस कदर नार्मल हुए जा रहे कि वैलेंटाइन डे पर तमाम पार्कों में जिन पुलिसवालों की ड्यूटी लगाई गई, वे कोविड-पूर्व स्तर की कमाई कर रहे है

रूठना-मनाना शुरु हो गया है। 2020 तो मोटे तौर पर सिर्फ डरने-डराने की क्रिया में ही गुजरा। बंदा डरा रहता था कि कहीं निकल न ले। सच में जब मौत का खौफ सिर पर हो, तब न रूठना याद रहता या मनाना याद रहता। बीता साल तमाम लोगों को दार्शनिक बना गया। कई लोग इस तरह की बातें करते दिखते थे-क्या है जी सब यहीं धरा रह जाएगा। सब माया मोह है। ऐसे दार्शनिक 2021 में फरवरी आते-आते ही रिक्शेवालों से इस बात पर झगड़ने लगे हैं कि वहां तक जाने के 12 रुपये नहीं आठ ही रुपये दूंगा। हाय पुराने दिन लौट आए। टीवी सीरियलों में सासें बहुओं के खिलाफ षड्यंत्र पुराने टाइप से ही करने लगी हैं। ट्रैफिक जाम शहरों में पुराने स्तर पर लौट आया है।

कोरोना काल में प्रदूषण खत्म, अब खबरें आने लगी हैं प्रदूषण रिकार्ड स्तर पर

कोरोना काल में इस तरह की खबरें आया करती थीं-प्रदूषण खत्म हुआ और साफ हुआ आसमान। अब फिर नार्मलत्व की ओर लौट रहे हैं शहर और पुरानी नार्मल टाइप खबरें आने लगी हैं-प्रदूषण रिकार्ड स्तर पर। नकली दवाओं की खपत भी बढ़ चली है। बाजार में और दवा तस्कर भी घणे सक्रिय हो लिए हैं। जेबकतरों की आय भी कोविड पूर्व स्तर पर जा चुकी है। एक मित्र डॉक्टर ने बताया कि अब सिर्फ कोरोना वाले डॉक्टर ही न कमा रहे हैं, बल्कि दूसरी बीमारियां भी पर्याप्त नोट प्रदायक हो गई हैं। अफसर रिश्वत वगैरह खाने के आरोप में कोविड पूर्व के स्तर पर सक्रिय हो गए हैं। अब शिकायतें भी धीमे-धीमे कोरोना से हटकर उसी पुराने लेवल पर आ रही हैं। सच में पुराना जमाना आ रहा है।

[ लेखक हास्य-व्यंग्यकार हैं / Dainik Jagran ]

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