महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की जयंती, कुप्पा घाट आश्रम में सुबह से लेकर शाम तक कार्यक्रम

महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की जयंती शुक्रवार को वैशाख शुक्ल पक्ष के चतुर्दशी में मनाई जाएगी। कुप्पा घाट आश्रम में सुबह से लेकर शाम तक कार्यक्रम होंगे। .

जयंती समारोह में भाग लेने के लिए नेपाल, कोलकाता, दिल्ली, मुंबई के अलावा मधेपुरा, पूर्णिया, सहरसा आदि जगहों से अनुयायी कुप्पा घाट पहुंच गए हैं। प्रवक्ता डॉ.स्वामी गुरु प्रसाद ने गुरुवार को बताया कि शुक्रवार सुबह तीन से चार बजे तक ध्यानाभ्यास व पांच बजे कुप्पा घाट से बैंड-बाजे के साथ प्रभातफेरी निकाली जाएगी। आठ बजे गुरु निवास में पुष्पांजलि कार्यक्रम होगा। 11 बजे सामूहिक भंडारा का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि दिन के एक बजे से भजन-कीर्तन, दो बजे से साधु-महात्माओं के द्वारा महर्षि मेंहीं के व्य्त्विव पर परिचर्चा की जाएगी। कार्यक्रम को सफल बनाने में अरुण कुमार अग्रवाल, अध्यक्ष दीनबंधु यादव, कृष्ण कुमार यादव, विजय यादव व शारदानंद बाबा जुटे हैं।.

महर्षि मेंहीं फिर कठिन साधना करने लगे। कटिहार के मनिहारी के गढ़ मुक्तेश्वर गए। वहां से भागलपुर के परबत्ती स्थित आश्रम पहुंचकर भजन, ध्यान व संतमत का प्रचार करने लगे। प्रवक्ता ने बताया कि कुप्पा घाट में प्राचीन गुफा के बारे में उन्हें जब पता चला तो यहां 1933 व 1934 दो वर्ष तक झोपड़ी बनाकर कठिन साधना की। बाद में 1960 में कुप्पा घाट आश्रम बना। आठ जून 1986 को देह त्यागने के बाद आश्रम में उनका समाधि बनाई गई।

उन्होंने बताया कि पूर्णिया जिला स्कूल में आठवीं की पढ़ाई के दौरान आत्मात्यिक संस्कार से प्रेरित होकर रामचरित्रमानस, महाभारत, सुखसागर आदि धर्मग्रंथ पढ़ डाले। 1904 में मैट्रिक परीक्षा के अंग्रेजी प्रश्नपत्र के एक सवाल के जवाब में रामचरित्रमानस की ‘देह धेरे कर यहि फल भाई, भजिय राम सब काम बिहाई’ लिखकर परीक्षा भवन से बाहर निकल गए। बाद में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में संत बाबा देवी साहब से शिक्षा प्राप्त की।.

भागलपुर। महर्षि मेंहीं का जन्म 28 अप्रैल 1885 को वैशाख शुक्ल पक्ष के चतुर्दशी में मधेपुरा के खोखशी में नाना काशीनाथ दास के यहां हुआ था। इनका पैतृक गांव पूर्णिया के सिकलीगढ़ (धरहरा) है। प्रवक्ता डॉ.स्वामी गुरु प्रसाद ने बताया कि उनके पिता का नाम बबुजनलाल दास व दादा का नाम नसीब लाल दास था। महर्षि मेंहीं का बचपन का नाम रामानुग्रहलाल दास था। बाद में इनके चाचा भरतलाल दास ने इनका नाम बदलकर मेंहीं रख दिया था। .

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