January 24, 2022

Naugachia News

THE SOUL OF THE CITY

क्या आप जानते है.. भागलपुर के तत्कालीन कलक्टर को अपने तीर का निशाना शहीद तिलकामांझी ने बनाया

भागलपुर। आज शहीद तिलकामांझी का शहादत दिवस है। भागलपुर में उनसे जुड़ी कई स्‍मृतियां हैं। जानेमाने इतिहासकार शिवशंकर सिंह पारिजात बताते हैं कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम वर्ष माने जाने वाले 1857 से भी तकरीबन आठ दशक पहले विदेशी हुकूमत की दमनात्मक नीतियों के खिलाफ बगावत छेड़ शहीद तिलकामांझी ने भागलपुर के तत्कालीन कलक्टर को अपने तीर का निशाना बनाया, जिससे आक्रोशित अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें सरेआम क्रूरतापूर्वक 13 जनवरी सन् 1785 को पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी थी।

इस बिना पर यदि तिलकामांझी को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आदि-विद्रोही की संज्ञा दी जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी, पर विडंबना यह है कि तत्कालीन साम्राज्यवादी हुकूमत, जिससे बारे में कहा जाता है कि उनके राज में कभी सूर्यास्त नहीं होता था, को यह गंवारा न हुआ कि उसके किसी आला अधिकारी की मौत एक आदिवासी विद्रोही के हाथों होने की बात दुनिया में फैले और उन्होंने अपने हर दस्तावेज से तिलकामांझी नाम के किसी शख्स के होने की बात मिटा डाली और उनके बारे में भ्रामक बातें फैलाईं।

बात यहीं खत्म नहीं हुई। आजादी के बाद के वर्षों में भी तिलकामांझी के व्यक्तित्व व कृतित्व की उपेक्षा का सिलसिला जारी रहा। ब्रिटिश रेकार्ड व रेफरेंस को आंख मूंदकर मानने वाले अंग्रेजीपरस्त व मेकियाविलन मनोवृत्ति के इतिहासकारों ने तिलकामांझी के योगदान को कमतर आंकते हुए उनके अपूर्व योगदान को मुकम्मल रूप से आने नहीं दिया, किंतु भारत और खासकर बिहार-झारखंड में आदिवासी संघर्ष व आंदोलन पर गंभीर विवेचना करनेवाले एलपी. विद्यार्थी, डा.एसके. सिंह, एलएम. विद्यार्थी, आर्थर एक्का, बकलैंड, डी. किस्कू, डा. दिनेश नारायण वर्मा तथा राजेंद्र प्रसाद सिंह (मैगसेसे एवार्ड) सहित प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलकामांझी के संघर्ष और योगदान को खासी अहमियत अपनी कृतियों में दी है।

तिलकामांझी के विद्रोह की पृष्ठभूमि की बात करें तो 1764-65 में मुगल नवाब से बंगाल की दीवानी (जिसमें बिहार व झारखंड के क्षेत्र भी शामिल थे) मिल जाने के बाद साम्राज्यवादियों ने ऐसी दमनात्मक नीतियां बनाईं, जिससे जल, जंगल, भूमि, वन-उत्पादों व गांवों की जमीन के इस्तेमाल पर आधारित आदिवासियों की जीवन-शैली तहस-नहस होने लगी। शोषण और अत्याचार का आलम यह कि 1770 के भीषण अकाल के समय भी उनसे जबरन लगान वसूली की गई। फलत: राजमहल की पहाडिय़ों व भागलपुर प्रक्षेत्र में विद्रोह की आग सुलग उठी, जिसका नेतृत्व तिलकामांझी ने किया।

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