बिहार : पत्नी से बेपनाह मोहब्बत.. जीते-जी करवा लिया अपना श्राद्धकर्म, स्थापित करवाई प्रतिमा

बिहारीगंज (मधेपुरा)। इसे पत्नी से बेपनाह प्रेम कहें या भविष्य की चिंता? एक जीते-जागते इंसान ने अपना श्राद्धकर्म भी करवा लिया और प्रतिमा भी स्थापित। उसके उठाए गए इस कदम की चर्चा चारों ओर है। वहीं, श्राद्धकर्म कराने वाले का कहना है कि मरने के बाद मैं कौन सा देख रहा हूं कि मेरे स्वजन पूरे विधि-विधान से मेरा श्राद्धकर्म करेंगे या नहीं। पत्नी की बरसी पर ये अवसर मेरे लिए बहुमूल्य हो जाता है। आज मेरी पत्नी जहां कहीं भी होगी, खुश होगी। भले उसने अपनी आंखों से ना देखा हो।

 


दरअसल, श्रद्धापूर्वक किए गए कार्य को ही श्राद्ध कहते हैं। ङ्क्षहदू धर्म में श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसके बाद श्राद्ध कर्म किया जाता है। लेकिन बिहार के मधेपुरा जिले के बिहारीगंज प्रखंड अंतर्गत कुश्थन वार्ड दो के बौकू शर्मा ने इस रिवाज को ही बदल दिया। उन्होंने जीवित रहते अपना श्राद्धकर्म करवा दिया। इसके लिए उन्होंने पत्नी उर्मिला देवी की बरसी के दिन को चुना।

 

10 गांव में भ्रमण करवाई प्रतिमा

बौकू ने अपने साथ-साथ पत्नी की भी प्रतिमा बनवाई और इस कार्यक्रम की जानकारी उन्होंने पड़ोस के सभी गांवों में दी। इसके बाद गाजे-बाजे के साथ प्रतिमाओं का भ्रमण 10 गांवों में कराया। इस दौरान पति-पत्नी की प्रतिमाओं को देखने के लिए रोड के दोनों ओर लोगों की भीड़ लग गई। हर जगह इस बात की चर्चा होने लगी की बौकू ने ऐसा क्यों किया? कुछ लोगों ने इसे पत्नी से बेपनाह मोहब्बत बताई तो कुछ ने इसे अलग नजरिए से जोड़ा। हालांकि बौकू के गांव वालों ने इसका पूरा सहयोग किया। इतना ही नहीं सरपंच निर्मल यादव तो उनके इस आयोजन में हर पल मौजूद रहे। इनके साथ-साथ जदयू नेता पंकज शर्मा, दीपो यादव, रामचंद्र यादव, मख्खन मंडल, मनोज शर्मा, रासबिहारी ठाकुर, जयनंदन मंडल सहित अन्य ग्रामीणों का सहयोग किया।

खेती-किसानी कर गुजर-बसर करते हैं बौकू

बौकू शर्मा किसान हंै। जिसे दो पुत्र अनिल शर्मा व संजय शर्मा व दो पुत्री सुधा देवी व रानी देवी सभी शादीशुदा है। बौकू का कहना है मृत आत्माओं का श्राद्ध करने की प्रक्रिया पूर्वजों से चलती आ रही है। लेकिन धर्म शास्त्र के आधार पर जीवित व्यक्ति को भी श्राद्ध करने की अनुमति है। मरणोपरांत उनके स्वजनों श्राद्ध करेंगे या नहीं करेंगे। यह हम देख नहीं सकेंगें। इसलिए पत्नी की मृत्यु के बाद ही जीवनकाल में हीं अपना श्राद्ध करने का मन बना लिए थे। जिसे पत्नी की बरसी के दिन पूरा किया।

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