पूर्णिया : पैरों में बंधी घुंघरु जिस्म की चाहत रखने वालों की कतार.. गुम होती गई पायल की झंकार

कद्रदान बेदर्द होते गए और पायल की झंकार गुम होती गई। कला के पुजारियों की भीड़ में जिस्म की चाहत रखने वालों की कतार बढऩे लगी। पैरों में बंधी घुंघरु भी बे आबरू होने लगी और फिर सुर-ताल का शोर सिमटता चला गया। अब बस नाम का यह नर्तकियों का बसेरा रह गया है। नाम आज भी मुजरा पट्टी है, लेकिन अधिकांश परिवारों का पेशा बदल चुका है।

लक्ष्मी का आंगन कहे जाने वाले पूर्णिया शहर के गुलाबबाग का अलग सांस्कृतिक पहचान भी रहा है। शाम ढलते ही गुलाबबाग के मध्य लगभग एक किलोमीटर की दूरी में बसे मुजरा पट्टी से उठती पायल की झंकार पूरे परिक्षेत्र को कभी संगीत की सुगंध से सरोबार कर देता था। आज यह पट्टी भी बाजार का शक्ल ले चुका है और वाद्य यंत्रों की मधुर आवाज बाजार के शोर में गुम हो चुकी है। दरअसल शहर का यह इलाका कभी कुशल नर्तकियों का बसेरा माना जाता था। उन परिवारों के लोग आज भी मौजूद हैं, लेकिन अधिकांश ने इस पेशे को बाय-बाय कर दिया है।

गुलाबबाग मेले से भी जुड़ी इस बस्ती की कहानी

कभी राजा पीसी लाल द्वारा गुलाबबाग में शुरु किए गए मेले की धूम पूरे उत्तर बिहार में थी। तकरीबन एक माह चलने वाले इस मेले में पूरे इलाके के जमींदारों की जमघट लगती थी। इसके अलावा अन्य प्रभावशाली सहित आम लोगों का जुटान यहां होता था। मेले में पहुंचने वाले लोगों के लिए गीत-संगीत व नृत्य की भी उम्दा व्यवस्था रहती थी। जानकारों के अनुसार इन नर्तकियों का पदार्पण उस मेले की शुरुआत से ही जुड़ा था। बाद में उन नर्तकियों का स्थाई बसेरा यहां बनता गया और उसे लोग मुजरा पट्टी के नाम से जानने लगे। संगीत व नृत्य के कद्रदानों के भरोसे इन परिवारों की रोजी-रोटी चलती रही।

इधर राजा पीसी लाल के गुजरने के बाद गुलाबबाग मेले का रंग भी फीका पड़ता गया और कालांतर में संगीत व नृत्य के पुजारियों की संख्या में घटती गई। दो दशक पूर्व से यह मेला अस्तित्व में नहीं है और अब इस बस्ती में भी पायल की झंकार लगभग थम सी गई है। कभी इस बस्ती की मशहूर नृत्यांगना मानी जाती रही नगमा( काल्पनिक नाम ) बताती हैं कि अब न तो संगीत व नृत्य के कद्रदान रहे और न ही पूर्व जैसा परिवेश। आज कला के बजाय जिस्म को निहारने वालों की तादाद बढ़ गई है। वे लोग कला की कमाई खाते थे। आबरु बचाने के लिए पैरों से घुंघरु खोलना ही एक मात्र विकल्प बच गया था। अब वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर उसे दूसरे क्षेत्र में आगे बढ़ाने का जतन कर रहे हैं।

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