समुद्रमंथन नामक WhatsApp ग्रुप में पत्रकार ऋषव मिश्रा कृष्णा ने बाबा अनंत आत्मानंद उर्फ आशीष आनंद उर्फ स्फोटाचार्य जी महाराज से कई तरह के प्रश्न पूछे. बाबा ने सभी सवालों का जवाब सहजता से दिया. उन्होंने धर्म आध्यात्म और आडंबर, धर्म अध्यात्म और बाजारवाद के अलावा भूत प्रेतों के बारे में भी विस्तार से बताया. प्रस्तुत है नवगछिया डॉट कॉम के साक्षात्कार कॉलम में बिना किसी काट छांट के बाबा स्फोटाचार्य के साक्षात्कार का दूसरा भाग…..


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सवाल : सनातन धर्म में तीर्थ, मंदिर, मूर्तिपूजा, कर्म कांड की काफी महत्ता है। सनातन धर्म में धार्मिक कहलाने में कई आडम्बरों का सहारा लेना पड़ता है। क्या यह सही है ?

बाबा स्फोटाचार्य : सनातन धर्म पृथ्वी से सम्बंधित धर्म नहीं है. यह परमात्मा से उत्पन्न नियमों का विज्ञान है. और इसके बिना इस ब्रह्माण्ड का कोई कण क्रिया शील नहीं होता, न ही उत्पन्न होता है. यह आचरण संहिता नहीं है. और पुराणों में इस सत्य को कथाओं के द्वारा समझाया गया है. अब अन्धास्थावादी उन कथाओं को पकड़ कर बैठ जाता है. और किसी संस्कृति की आचरण संहिता को सनातन धर्म समझने लगता है. तो यह उसकी मूर्खता है. इसमें प्राचीन ऋषियों का क्या दोष है. अब कोई पृथ्वी को गृह समझने लगे, योगासन को योग समझने लगे, कैलाश को हिमालय पर्वत की छोटी समझने लगे और पातल को पृथ्वी के अन्दर ढूँढने लगे तो इसमें बेचारे गुरुओं का क्या दोष है। सनातन धर्म ब्रह्माण्ड का धर्म है. और इसकी समस्त व्याख्याएं ब्रह्माण्ड से सम्बंधित हैं। सनातन धर्म के अनुसार मूर्ति पूजा सबसे निम्न स्तर के मानवीय मष्तिष्क के विचार शक्ति को क्रियान्वित करने का एक सफल माध्यम है जो साधक के विश्वास और आस्था से जुड़ी है। इसी का यह सूक्ष्म विज्ञान है। तीर्थ और मंदिर के विषय में मैं शास्त्रोक्त ही दर्शाना पसंद करूँगा – पार्वती से भगवान् शिव कहते हैं –

इदं तीर्थं इदं तीर्थं भ्रमन्ति तामसा जनाः।
आत्मतीर्थं न जानन्ति कुतः मोक्षः शृणु प्रिये।।

ऐसा तीर्थ है ! ऐसा तीर्थ है !- ऐसा कहते हुए तामसी लोग भटकते रहते हैं। वे अपने भीतर आत्मतीर्थं को नहीं जानते। ऐसे लोगों के लिए मोक्ष कहाँ। वस्तुतः चिन्तनरत साधक के लिए तीर्थ का विधान नहीं है अपितु अधिक से अधिक समय चिंतन में देने का विधान है , किन्तु ऐसे लोग हजार में एक होते हैं –

नर सहस्त्र महं सुनहु पुरारी ।
कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।।

शेष निन्यानवे दशमलव नौ प्रतिशत लोगो के लिए तीर्थ का पूर्ण महत्त्व है, मंदिर ही आंरभिक प्रेरणास्थल है।

तीर्थाटन साधन समुदाई ।
जोग विराग ज्ञान निपुनाई।।
जहँ लगि साधन वेद बखानी ।
सबकर फल हरि भगति भवानी।।

तीर्थाटन इत्यादि सभी साधन का एकमात्र फल है भगवान् की भक्ति। अतः जहाँ जाने से श्रद्धा सब ओर से सिमटकर सर्वत्र व्याप्त एक परमात्मा में स्थिर न हो जाती हो, जहाँ आत्मदर्शन की विधि न बतायी जाती हो, लोग स्वयं क्रिया में चलकर आपको भी आत्मपथ पर चलने का आह्वान न करते हों, जहाँ जाने से बिषयों से वैराग्य और इन्द्रिय संयम की प्रेरणा प्रोत्साहन न मिलता हो, वह तीर्थ तीर्थ नहीं है , वह मंदिर मंदिर नहीं है । वहाँ जाने से आपका नुकसान होगा, कल्याण कदापि नहीं। जो स्वयं पवित्र हो गए हों और आपको भी पवित्र करने की क्षमता रखते हों वे तीर्थ हैं, इसलिए जैन समाज में महापुरुषों को तीर्थंकर कहा जाता है और चिंतन के इस पवित्रपथ में जो आ गया वह तीर्थ का निवासी है।
इसी को लक्ष्य करके कहते हैं कि घर में रहकर भजन करो। यदि गलती करोगे तो भगवान् माफ़ कर देंगे; किन्तु घर छोड़ने के बाद चिंतन के इस पथ में यदि थोड़ी भी गलती हो गई तो भगवान् कभी क्षमा नहीं करेंगे, उसका इलाज करेंगे । “जिमि तीरथ कर पाप” – वह तीर्थ का पाप है।
प्रश्नोत्तरी में आदि शंकराचार्य कहते हैं – “तीर्थं परं किं?”

अर्थात सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कौन है ? ” स्वमनो विशुद्धः” – विशेष रूप से शुध्द किया हुआ अपना मन ही सर्वोपरि तीर्थ है।

सवाल : देखा जा रहा है कि सनातन धर्म बड़ी तेजी से सिमट रहा है। जबकि अन्य धर्म का विस्तार बड़ी तेजी से हो रहा है। विश्व में एक भी ऐसा देश नहीं है जो हिन्दू राष्ट्र है। क्या सनातन धर्म पतन की ओर अग्रसर है ?

स्फोटाचार्य : बरसात के मौसम में बहुत से घास पतवार निकल आते हैं, इससे यह सिद्ध नहीं होता कि संसार से फसल मिट जाऐंगे। समय आते ही ये मौसमी धर्म विलुप्त हो जाऐंगे।
चाहे वृक्ष कितना ही विशाल ही क्यों न हो, एक अमरलत्ती ही सबको ढँककर रखते हैं और उसे सुखा भी देते हैं। इसी प्रकार सारा संसार ही मौसमी धर्म क्यों न हो जाए , सत्यधर्म- सनातनधर्म-सार्वभौमधर्म के एक प्रणेता ही सबका परिमार्जन करने में समर्थ है। पूरे विश्व में सनातन ज्ञान ही होगा । दूसरा नहीं। फ्रांस की भविष्यवक्ता जूल वर्न ने भी यह भविष्यवाणी की है कि २१वीं सदी में भारत में धर्म का एक ऐसा नया क्रान्ति आएगा, जिसका प्रमाण विज्ञान देगा और संसार के सभी लोग नतमस्तक होंगे। स्वामी विवेकानंद जी ने भी अमेरिका में ऐसे ही धर्म कि आह्वान करते हुए कहा था कि सारे दुनियाँ आपके अनुयायी होंगे। वही धर्म “सत्यधर्म-सार्वभौमधर्म” है जो सनातन ज्ञान को स्पष्ट दर्शाता है। और इसकी पारदर्शिता में सम्पूर्ण विश्व दृश्यमान है।

सवाल : क्या सनातन धर्म के अलावा सभी धर्म आपके नजर में मौसमी है ? क्या आपका यह नजरिया सही है ?

स्फोटाचार्य: यह मेरा नजरिया नहीं बल्कि यथार्थ है। किसी भी धर्म का इतिहास तीन हजार या चार हजार वर्षों से ज्यादा का नहीं है और सनातन धर्म को छोड़कर न ही किसी धर्म ग्रंथ में सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय ज्ञान समाहित है । संसार के किसी भी धर्म ग्रंथों की तुलना सनातन धर्म के विक्षिप्त और संकीर्ण मनुष्यों द्वारा प्रतिपादित मनुस्मृति से की जाती है, जबकि मनुस्मृति एक आचार संहिता है। एक कहानी मनु और शत्रुपा, आदम और हौआ इत्यादि। इसलिए इस प्रकार के कहानी वाले धर्म मूल हो ही नहीं सकता। जैसा कि मैंने पहले बताया कि सनातन धर्म ब्रह्माण्डीय ज्ञान का धर्म है। इसकी सभी व्याख्याएँ ब्रह्माण्डीय है। आज के आधुनिक विश्व वैज्ञानिक ने जो सफलता प्राप्त किया है वह सभी पहले ही सनातन ज्ञान में प्रतिपादित किया जा चुका है जो खरबों वर्ष पहले हुआ है। जिस सेल्स और कोशिकाओं का ज्ञान आज विश्व विज्ञान ने पाया है वह खरबों वर्ष पूर्व ही सनातन ज्ञान में सहस्त्रार के ज्ञान से संबोधित किया है, जो मष्तिष्कीय ज्ञान का एक संकेत है।
वर्तमान युग का भी अनेकों प्रमाण है कि किसी देश के पास शून्य अंक नहीं था और न ही नौ से अधिक संख्या थी तो वे कैसे पुरातन और सनातन हो सकते हैं। यह जग जाहिर है कि भारत ने ही शून्य और दशमलव दिया जिससे आज तक आगे बढ़ रहा है। इससे सभी धर्मों की संकीर्णता का प्रतिपादन स्पष्ट हो जाता है। जबकि सनातन ज्ञान में पहले से ही महाशंख और अनन्त अंकों का ज्ञान मौजूद है। अत: यह सिद्ध होता है कि ये मौसमी हैं। जो शाश्वत था, है और वही सनातन ही शाश्वत रहेगा।

सवाल : क्या इस तरह के विचार से दूसरे धर्म को मानने वाले लोगों की भावनाएं आहात नहीं होंगी ! क्या आपको योगी आदित्य नाथ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए ?

स्फोटाचार्य: बहुत ही उत्तम प्रश्न है । जैसा कि स्वामीजी और त्रिवेदी जी ने कहा मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि धर्म का मतलब कोई मजहब व सम्प्रदाय नहीं होता। इस विषय पर मैं जैन विचारों के स्तुति की एक पंक्ति रखना चाहूँगा – “जाति, वर्ण व सम्प्रदाय से मुक्त धर्म की भाषा”॥ महाभारत के युद्ध को धर्म युद्ध कहा जाता है। यह युद्ध दो मजहबों या सम्प्रदायों के बीच तो नहीं था।
अत: यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्म का महत्व किसी मजहब से नहीं अपितु ज्ञान की पराकाष्ठा का सार्वभौमिकता से है। सनातन ज्ञान की जो पराकाष्ठा है वह “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “कृणवन्तो विश्वमार्यम्” से है। इतना उच्चतर और सार्वभौम ज्ञान और किसी धर्म में नहीं।
वसुधैवकुटुम्बकम् के द्वारा भारतीय मनीषियों ने उदार मानवता का परिचय दिया है और कृण्वन्तो विश्वमार्यम् के द्वारा मनीषियों ने मानव ही नहीं अपितु वैश्विक सम्पूर्ण जीवों के प्रति उदार और समानता व सार्वभौमिकता का उदघोष किया है। विद्वानों ने कृण्वन्तो विश्वमार्यम् शब्द का अर्थ “पूरे विश्व को आर्य बनाओ” दिया है जो सत्य है परन्तु आर्य शब्द को आर्य के स्थिन पर “श्रेष्ठ” शब्द का उपयोग ज्यादा उपयुक्त है। अर्थात् कृण्वन्तो विश्वमार्यम् का अर्थ हम यह कहें कि “विश्व को यानि विश्व के सम्पूर्ण जीव को श्रेष्ठ बना दो।” इससे बड़ा सार्वभौमिकता क्या हो सकता है। सनातन ज्ञान किसी के मजहब परिवर्तन की बात नहीं करता अपितु उसे श्रेष्ठ बनाने की बात करता है। तो इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी धर्म को आहत होने का कोई विकल्प ही नहीं।
और जहाँ तक योगी आदित्यनाथ जी से मेरी श्रेणी समता की बात है तो मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मेरा कोई भी विचार किसी सम्प्रदाय व मजहब व उनके के स्त्रियों के प्रति दूषित नहीं और न ही मेरा विचार हिन्दुत्व होने की घोषणा करता, कतिपय मैं हिन्दू हूँ। मैं सनातनी हूँ और सत्यधर्मा हूँ। जो सम्पूर्ण जीव को श्रेष्ठ भावों से सम्बोधित करता है। धर्म का अर्थ सर्वदा ही सत्य ज्ञान से सम्बद्धता रखता है । धर्म का सूत्र है – धारयते इति धर्म: ॥ सत्य विचार व ज्ञान की धारणाओं को धारण करना ही धर्म कहलाता है। सनातन ज्ञान इतना उन्मुक्त है कि यह निरपेक्ष ही है। सनातन ज्ञान किसी मजहबों और सीमाओं से, देश व काल से बँधा नहीं, अपितु सनातन ज्ञान देशकालातीत है। आकाश की अनन्त रेखाओं से भी सनातन ज्ञान को नहीं घेरा जा सकता। वस्तुतः अनन्त आकाश की सीमा भी सनातन ज्ञान के अधीन है। यह इतना व्यापक होने के कारण ही श्रेष्ठ और सार्वभौम है। सनातन ज्ञान की तुलना वास्तव में धरती के किसी भी आचरण संहिता से नहीं किया जा सकता। यह अत्यंत विराट और व्यापक है।

सवाल : गौ हत्या को लेकर आपका स्टैंड क्या है ? आपको क्या लगता है, गौ हत्या जैसे विषय पर इतना हंगामा ठीक है ?

स्फोटाचार्य: ये सब राजनैतिक मुद्दे हैं मानवों की हत्या में इतना उबाल नहीं हुआ कभी । जब नरसंहार हुआ तो। संतों का कार्य क्षेत्र मोक्ष से संबंधित है। अत: निवेदन है कि ऐसे सवाल राजनेताओं और सेवकों के लिए सुरक्षित रखा जाय ।

सवाल : भगवन शिव के बारे में कहा जाता है कि शिव ने समुद्र मंथन में निकले विष का पान किया तो वे गांजा, भांग खाते हैं। मानव तर्क देता है कि मैंने भी अपनी जिंदगी में कई कडुवे घूंट पिए इसलिए मैं भी गांजा भांग खाता हूं। शराब पीता हूँ। शिव मेरे आदर्श हैं। इस संधर्भ में आपका ज्ञान क्या कहता है ?

स्फोटाचार्य: यह सब अज्ञानता और मूढ़ता का प्रतीक सोच है। इस विषय पर मैंने समुद्र मंथन का आध्यात्मिक रहस्य दिया है –
?समुद्र मंथन का?
?आध्यात्मिक सत्य?

ये तो पौराणिक कथा है जो व्यक्ति के वास्तविक जीवन से बहुत गहरे तौर पर जुड़ी हुई है। इस कथा में एक गुप्त कहानी भी छिपी हुई है जो व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करती है।
समुद्र मंथन की कथा, उसके पात्र और मंथन के बाद सागर से निकली वस्तुओं का व्यक्ति के जीवन से क्या और किस तरह का आध्यात्मिक संबंध है।
यह कहानी मनुष्य द्वारा किए गए उन प्रयत्नों से जुड़ी है जो उसे मोक्ष और अलौकिक सत्य की शरण में ले जाने में सक्षम हैं। इस कहानी में देवताओं का किरदार व्यक्ति के भीतर छिपी इच्छाओं को प्रदर्शित करता है, जिन्हें पूरा करने के लिए वह हर कोशिश करता है। देवता आपकी इन्द्रीय और समझ को दर्शाते हैं जबकि असुर आपकी नकारात्मक इच्छाओं और आपके भीतर छिपी बुराइयों के प्रतीक हैं। क्षीर सागर आपकी अंतरचेतना का प्रतीक है। मस्तिष्क को हमेशा सागर माना गया है क्योंकि इसके भीतर बहुत सी चीजें छिपी हैं वहीं विचार और भावनाएं इसकी लहरों के समान हैं जो समय-समय पर अपना रुख बदलती रहती हैं।

मंदार, अर्थात मन और धार, पर्वत आपकी एकाग्रता को दर्शाता है। क्योंकि यह एक धार यानि एक ही दिशा में सोचने की बात कहता है जो एकाग्रता से ही संभव है। विष्णु का अवतार कछुआ, अहं को छोड़कर एकाग्रता की राह अपनाने को दर्शाता है वहीं वासुकि सर्प इच्छाओं का प्रतीक है। इसके अलावा हलाहल, भौतिक जीवन से जुड़े दुख और परेशानियों को दर्शाता है। हमने कई लोगों को यह कहते सुना है कि जब हम साधना के पथ पर चलते हैं तो शुरुआत में कई परेशानियों से जूझना पड़ता है। भौतिक दुख या जुड़ाव अर्थात हलाहल साधना के पथ पर चलने के बीच में आने वाली पहली समस्या है।
हलाहल को ग्रहण करने वाले भगवान शिव भ्रम का विनाश करने वाले पवित्र देव हैं। वह इच्छा और तत्परता का प्रतीक है जो साधना के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए जरूरी है। इसके अलावा वे मस्तिष्क पर नियंत्रण करने को भी दर्शाते हैं। मोहिनी के आकर्षक रूप में भगवान विष्णु गर्व और भटकाव का प्रदर्शन करते हैं जो आपको अमृत यानि जीवन के सार से दूर करता है। ये आखिरी दो ऐसी चीजें हैं जो व्यक्ति को उसके उद्देश्य पाने की राह से दूर करती हैं।
अत: सागर मंथन के दौरान निकली वस्तुओं का अर्थ एकाग्रता से ध्यान लगाने और भौतिक समस्याओं से खुद को दूर करने के बाद प्राप्त होने वाली सिद्धियों से है।

सवाल : कहा जाता है कि भगवान के घर देर होता है, अंधेर नहीं। आखिर भक्तों पर कृपा करने में भागवान देर क्यों करते हैं ?

स्फोटाचार्य: इसलिए कि जबतक भक्तों की प्यास व पुकार अंतिम घनीभूत न हो, जबतक भक्तों के अन्दर सम्पूर्ण त्राहिमाम न हो तबतक उनकी कृपा रुकी रहती है। ऐसा पूरा होते ही उसी क्षण कार्य घटित हो जाता है।

सवाल : भगवन इतने निष्ठुर क्यों होते हैं ? क्या भागवान की इस निष्ठुरता को समाप्त करने के लिए ही दिव्य युग की पैरवी कर रहे हैं ?

स्फोटाचार्य: भगवान दयानिधान हैं । परन्तु एक कठोर अनुशासन है कि जबतब विद्युत अपने सर्किट को पूरा नहीं करता तबतक बल्ब नहीं जलता । अर्थात् यदि बीच में तार टूटा हुआ हो तो जहाँ टूटा हुआ है वहीं विद्युत रुक जाती है। इसी प्रकार जहाँ तक भक्त के भावनाओं की तरंग बनी रहती है वहाँ पर बैठकर भगवान इंतजार करते हैं कि कब मेरा भक्त इसे अपने तक जोड़ ले। इससे स्पष्ट होता है कि भगवान इतने दयालु हैं कि वर्षों बैठकर भक्तों के भावनात्मक तरंगों के पूरा होने की प्रतिक्षा करते हैं। इस हेतु मीरा के अनमोल वचन हैं -“मध्य रात्रि प्रभु दर्शन दीन्हा प्रेम नदी के तीर । ” अर्थात् मध्य रात्रि मतलब जहाँ ज्ञान और अज्ञानता दोनों लय हो चुके हों। जबकि प्रेमरूपी नदी की कोई किनारा नहीं होता परन्तु, जहाँ ज्ञान अज्ञान के लय का केन्द्र अर्थात् सम्पूर्ण समर्पण हो जाता है वहीं और उसी क्षण भगवान की भगवत्ता व दर्शन प्रकट हो जाते हैं। यानि सम्पूर्ण समर्पण ही वह निर्बाध तरंग है भगवान और भक्त के बीच जो सर्किट को पूरा करती है। अत: इसमें कोई संदेह नहीं कि इसी खाई को पाटने का प्रयास ही दिव्ययुग की अवधारणा है। ॐ

सवाल : मशहूर चित्रकार आशीष कुमार से स्फोटाचार्य बनने तक की क्या कहानी है ? कहाँ से आपको प्रेरणा मिली है, किन सन्तों से प्रभावित हुए ? आपके गुरु कौन हैं ?

स्फोटाचार्य: कहानी तो बड़ी लंबी होती है, जनम-जनम की होती है। सामान्यतया इस प्रश्न के उत्तर से बचने का ही प्रयास किया जाता है और उत्तर यह देना पड़ता है कि यही ईश्वर की मर्जी थी। इसका कारण यह है कि इस प्रश्न के उत्तर में जीवन के कुछ ऐसे सत्यों और तथ्यों के उजागर होने की संभावना हो जाती है, जिससे अपनी उपलब्धि और बड़ाई का बोध उत्पन्न हो जाता है। इस संदर्भ में जहाँ तक मुझे ज्ञात है जीवन में ऐसा करने से एक प्रकार से आत्महत्या ही हो जाती है। इसलिए ऐसे प्रश्नों के उत्तर से सामान्यतया ईश्वर की मर्ज़ी कहकर परहेज किया जाता है।
परन्तु विशेष परिस्थिति में ऐसे प्रश्नों का उत्तर यही विचार कर दिया जाता है कि जैसे किसी कर्म का फल आत्मदाह होता हो, यही समझकर दिया जा सकता है, क्योंकि अपनी बड़ाई का बोध कराना आत्महत्या ही है। ऐसा ही विशेष परिस्थिति मुझे प्रतीत हो रहा है। क्योंकि आप भी असामान्य हैं, यह समूह भी असामान्य है तथा परस्थिति और प्रश्न भी। अत: मैं इसे कर्म का फल समझकर स्वीकार करता हूँ, फिर भी मेरा प्रयास यही होगा कि कम से कम ऐसे तथ्यों का बोध हो और संक्षिप्त में हो ।
संसार के जीवों सहित त्रिदेवों और त्रिदेवियों के असहनीय वेदनाओं के कारण, उसे दूर करने के उपाय के कारण , जीवन कालचक्र बदलवाने के कारण यह बदलाव व सफर है।
और जहाँ तक नाम का प्रश्न है तो मेरे नाम के आगे “स्फोटाचार्य ” भारत के प्रथम अंगिका ध्वनि वैज्ञानिक माननीय डा. रमेश मोहन आत्मविश्वास जी का देन है, उनका सौगात है या यूँ कहें कि उन्होंने ही मुझे “स्फोटाचार्य “का खिताब प्रदान किया है।
जहाँ तक प्रेरणा की बात है तो यह जन्मों के संस्कारवश अन्तरप्रेरणा ही है। और मैं संसार के सभी संतों से प्रभावित हूँ। क्योंकि सबों ने अपने-अपने तरीके से ज्ञान दिया है। और मेरे गुरु वही हैं जो त्रिदेवों और वैदिक ऋषियों के गुरु थे। मैं उन्हें आत्मज्ञानी अनन्तात्मानन्द के नाम से जानता हूँ, जिसे आम भाषा में लोग “आत्मा” कहते हैं।

सवाल : आजकल धर्म आध्यत्म पर बाजारवाद बड़ी तेजी से हावी हो रहा है। विभिन्न संत, मुनि, बाबा एक अलग अलग ब्रांड बनते जा रहे है। अन्य बाबाओं के तरह क्या आप भी एक ब्रांड बनना चाहते हैं ?

स्फोटाचार्य: जो अन्तस में ब्राण्ड स्थापित कर लेता है उसे इस छोटी-सी पृथ्वी पर ब्राण्ड स्थापित करने का शौक नहीं होता । क्योंकि अन्तस ब्राण्ड स्थापित हो जाने का मतलब है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही अपना ब्राण्ड हो जाता है।

सवाल : क्या योग गुरु बाबा रामदेव के बाजारवाद के साथ साथ मानवतावादी सिद्धान्तों के कथित युगलबंदी से सहमत हैं ? आपको अगर मौका मिले तो क्या आप भी अपने उत्पादों का एक बाजार बनायेंगे ?

स्फोटाचार्य: बिल्कुल सहमत हैं क्योंकि वे खुलकर कहते हैं कि मैं एक व्यापारी हूँ। और जनता चाहे जैसे हो उनके साथ है तो मुझे सहमत नहीं होने का कोई प्रश्न ही नहीं है। मेरा बाज़ार सामग्री उत्पादन का नहीं बल्कि अधिमानस उत्पादन का होगा। जीवों में दिव्यता उत्पादन का है। जो अभी भी अपने स्तर पर कर ही रहे हैं।

सवाल : यह एक आम सवाल है। कई विद्वानों ने इसका उत्तर दिया लेकिन आज भी इस तरह के प्रश्न अनुत्तरित हैं। क्या भूत प्रेत का अस्तित्व इस धरती पर है ? क्या आपने प्रेत को देखा है ? प्रेत का अंतिम हश्र क्या होता है ? क्या मानव मारने के बाद तुरंत प्रेत बन जाता है ?

स्फोटाचार्य: हाँ है, देखा भी है। भूतप्रेत का हश्र भी मानव के जैसा कर्म पर ही आधारित है। यह स्पष्ट है – “कर्म प्रधान विश्व करि राखा।” सभी भूत नहीं बनते हैं।
एक भूत तो वह है जो समय बीत गया। दूसरा भूत योनि होता है। जिस व्यक्ति की अकाल मृत्यु होती है और मृत्यु के समय जैसी उसकी भावना होती है, उसी प्रकार के कर्म के लिए वह वैसा स्थान भी चुन लेता है। इसका शरीर एक प्रकार से छाया ही होता है, परन्तु चेतनता वही होती है जो एक जीव का होता है। ऐसा जीव अपने स्वभाव एवं संस्कार के कारण अपने कृत भी मानवों के तरह ही करते हैं। इनमें छाया होने के कारण एक विशेष गुण और शक्तियाँ होती है जो सामान्य मानव के पास नहीं होती। ऐसे जीव का वर्तमान नहीं होता। इसकी चेतना अतीत में ही लटकी होती है, इसी कारण यह भूत कहलाती है।
आत्मा (जीव)के तीन स्वरुप माने गए हैं- जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में वास करती है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासना और कामनामय शरीर में निवास होता है तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। यह आत्मा जब सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, उस उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।

भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि कहा जाता है।

भूतों के प्रकार : गति और कर्म अनुसार मरने वाले लोगों का विभाजन किया है- भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वेताल और क्षेत्रपाल। उक्त सभी के उप भाग भी होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार 18 प्रकार के प्रेत होते हैं। भूत सबसे शुरुआती पद है या कहें कि जब कोई आम व्यक्ति मरता है तो सर्वप्रथम भूत ही बनता है।

इसी तरह जब कोई स्त्री मरती है तो उसे अलग नामों से जाना जाता है। माना गया है कि प्रसुता, स्त्री या नवयुवती मरती है तो चुड़ैल बन जाती है और जब कोई कुंवारी कन्या मरती है तो उसे देवी कहते हैं। जो स्त्री बुरे कर्मों वाली है उसे डायन या डाकिनी करते हैं। इन सभी की उत्पति अपने पापों, व्याभिचार से, अकाल मृत्यु से या श्राद्ध न होने से होती है। ॐ
पशुयोनि, पक्षीयोनि, मनुष्य योनि में जीवन यापन करने वाली आत्माएं मरने के बाद अदृश्य भूत-प्रेत योनि में चले जाते हैं। आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। ऐसी 84 लाख योनियां है, जिसमें कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष और मानव आदि सभी शामिल हैं।

प्रेतयोनि में जाने वाले लोग अदृश्य और बलवान हो जाते हैं। लेकिन सभी मरने वाले इसी योनि में नहीं जाते और सभी मरने वाले अदृश्य तो होते हैं लेकिन बलवान नहीं होते। यह आत्मा के कर्म और गति पर निर्भर करता है। बहुत से भूत या प्रेत योनि में न जाकर पुन: गर्भधारण कर मानव बन जाते हैं।
पितृ पक्ष में हिन्दू अपने पितरों का तर्पण करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि पितरों का अस्तित्व आत्मा अथवा भूत-प्रेत के रूप में होता है। गरुड़ पुराण में भूत-प्रेतों के विषय में विस्तृत वर्णन मिलता है। श्रीमद्‍भागवत पुराण में भी धुंधकारी के प्रेत बन जाने का वर्णन आता है। ॐ

सवाल : आप न तो घोषित रूप से प्रवचन करते हैं और न ही आपसे मिलने का कोई स्थान निर्धारित है। अगर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में ज्ञान रूपी प्रकाश पाना चाहता है तो वैसे लोगों के लिए आपने क्या व्यवस्था किया है ? सभी तो व्हाट्सएप्प पर नहीं आ सकते।

स्फोटाचार्य: ऐसे जिज्ञासु फोन पर सम्पर्क करते हैं तो उसे मैं समय देकर नवगछिया कार्यालय में अथवा अपने घर पर ही निमंत्रित करता हूँ।

सवाल : बाबा आपने जो ईश्वर के स्वरूप को चित्रित किया है, क्या वह प्रामाणिक है ?

स्फोटाचार्य: जी वह चित्र संकेत रूप से आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कसौटी से अभिभूत है। सभी संतों को यहीं तक ज्ञात होता है, असम्प्रज्ञात तक। अभी तक यहीं तक का प्रमाण विज्ञान भी दे रहा है। अत: इससे आगे के रहस्यों को मैंने सार्वजनीय नहीं किया है क्योंकि यहाँ तक भी लोग नहीं समझ पाते हैं और कोई समझ भी जाते हैं तो उसमें डूब नहीं पाता। यह समझने वाला भी कोई बिरला ही है।

सवाल : आखिर आपको पता कैसे चला कि ईश्वर/परमात्मा का स्वरूप इस तरह का का है ? क्या इस तरह के स्वरूप की चर्चा पौराणिक ग्रंथों में है ?

स्फोटाचार्य: जी बिल्कुल है। पिण्डे स ब्रह्माण्डे, ब्रह्माण्डे स पिण्डे। भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण ने अपना रूप इसी विश्वरूप में ही दिखलाया है। अनेकों प्रमाण हैं। शिव संहिता में है –

जानाति य: सर्वमिदं स योगी नात्र संशय:।
ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथा देशं व्यवस्थित:॥

अर्थात् मनुष्य शरीर इस विशाल ब्रह्माण्ड की प्रतिमूर्ति है। जो शक्तियाँ इस विश्व का परिचालन करती है, वे सब इस मानव देह में वर्तमान हैं। ध्यान, धारणा व समाधि। और इसके साथ ज्ञान की चारों कक्षा में भी उत्तीर्णता प्राप्त करनी पड़ती है।
प्रथम कक्षा – श्रवण व पठन ज्ञान
द्वतीय कक्षा – चिंतन व मनन ज्ञान
तृतीय कक्षा – निदिसाध्य ज्ञान और
चतुर्थ कक्षा – अनुभव ज्ञान।
तब कोई मानव अतिमानसता से अधिमानसता की ओर अग्रसर हो पाता है।

(पत्रकार ऋषव मिश्रा कृष्णा ने बाबा के साक्षात्कार भाग 2 के सभी सवाल वर्ष 2016 के अगस्त और सितंबर माह में पूछे थे. )

By Rishav Mishra Krishna

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