फिल्म समीक्षा : जैकी-सोनू की ‘कुंग फु योगा’

अपने एक्शन (मुख्यत: चाईनीज मार्शल आर्ट) के अलावा अभिनेता जैकी चैन की फिल्में जोरदार मनोरंजन के लिए भी जानी जाती हैं। आज वो कुछ भी कर रहे हों, लेकिन उनकी असल पहचान 1985 में आई फिल्म ‘पुलिस स्टोरी’ से होती है। इसी तर्ज पर उनकी ‘प्रोजेक्ट ए’, ‘दि प्रोटेक्टर’, ‘विनर एंड सिनर्स’ और ‘व्हील्स ऑन मील्स’ जैसी फिल्में भी हैं, जो चैन को एक मुकम्मल मनोरंजक स्टार के रूप में स्थापित करती हैं। उनकी नई फिल्म ‘कुंग फु योगा’ में उन्हीं का एक संवाद है, ‘मुझे इंडियाना जोंस पसंद है…’ और शायद यही वजह है कि उनकी ये फिल्म इंडियाना जोंस के स्टाइल के काफी आस-पास ही दिखती है।

भारत-चीन के ऐतिहासिक सौहार्द के साथ शुरू हुई इस फिल्म के कथानक में एक खजाने का राज छिपा है। ऐसे विषय दुनियाभर में पसंद किए जाते रहे हैं। इंडियाना जोंस की तो अवधारणा ही ऐसी खोजों और कारनामों पर टिकी नजर आती है। अब चान भी इसके सम्मोहन में दिखते हैं।

ये कहानी शुरू होती है सदियों पहले मगध में हुए एक युद्धा से, जिसकी धुरी एक चीनी योद्धा के ईर्द-गिर्द है। ऐतिहासिक दास्तावेजों के माध्यम से मौजूदा दौर में उस युद्ध का वर्णन पुरातत्वविद् प्रो. जैक (जैकी चैन) अपने चीनी छात्रों संग साझा कर रहे हैं। तभी उनसे मिलने एक युवती आती है जो भारत से आई है और नाम है अस्मिता (दिशा पटानी)। उसके पास सदियों पुराना एक नक्शा है, जिसमें एक खजाने का राज छिपा है। इस खजाने का संबंध जैक की उस कहानी से भी है, जिसे वह अपने छात्रों को सुनाते आए हैं। अस्मिता के साथ उसकी एक सहयोगी कायरा (अमायरा दस्तूर) चीन आई है।

नक्शा पाकर जैक फूला नहीं समाता और फिर अस्मिता के अनुरोध पर वह अपने कुछ छात्रों संग खजाने की खोज में निकल पड़ता है। इस खोज में अस्मिता और कायरा भी जैक की टीम के साथ हैं। खोज का पहला पड़ाव चीन की बर्फीली पहाड़ियों के बीच पड़ता है, जहां ये सभी लोग जमा देने वाली बर्फीले पानी के बीच से होते हुए एक झरने की तह तक जाते हैं। काफी प्रयास के बाद उन्हें एक बड़े खजाने का छोटा हिस्सा मिल जाता है, लेकिन ऐन मौके पर रैंडल (सोनू सूद) वहां आकर सब अपने कब्जे में ले लेता है।

रैंडल का दावा है कि ये सारा खजाना उसकी पुश्तैनी संपत्ति है और वही उसका असली मालिक है, जबकि जैक का कहना है कि ऐसे खजाने किसी एक के नहीं होते, इसलिए इसे सरकार के हवाले कर देना चाहिए। इस पूरी बहस में रैंडल बाजी मार जाता है और जैक की टीम को वहां बर्फीले पहाड़ों में फंसा कर भाग जाता है। किसी तरह से जैक का एक साथी खजाने में मिले एक प्रतीक (हीरे के रूप में) अपने साथ ले जाने में कामयाब हो जाता है। वह उस प्रतीक को दुबई ले जाता है, जहां उसकी नीलामी होने वाली है। देखते ही देखते जैक भी वहां आ जाता है और नीलमी में से उस प्रतीक को खरीद लेता है, लेकिन अस्मिता वो प्रतीक चुरा कर अपेन साथ भारत ले आती है।

अब प्रतीक और खजाने की खोज में जैक को अपनी टीम के साथ भारत आना पड़ता है, जहां अस्मिता उसे वो प्रतीक लौटा देती है ताकि वह खजाने की खोज कर सके। जैक किसी तरह से उस प्रतीक की सहायता से सदियों पुराना खजाना खोज भी लेता है, लेकिन फिर से रैंडल बीच में आ जाता है और सब अपने कब्जे में कर लेता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि फिल्म की कहानी आकर्षित करने वाली है। इस कथानक में मनोरंजन की भी पूरी गुंजाइश है। लेकिन जिस ढंग से निर्देशक टॉन्ग ने इसे पेश किया है, वह बेहद बचकाना है। जैक की कार में बब्बर शेर का आना हो या फिर बर्फीले पहाड़ों में एडवेंचर। ये सब सुनने में जितना अच्छा लगता है, देखने में उतना अपील नहीं करता। यहां निर्देशक की कल्पना में रचनात्मकता की कमी दिखती है। शायद यही वजह है कि टॉन्ग ने इंडियाना जोंस की फिल्मों की लगभग कॉपी ही कर डाली है। उन्होंने तो जेम्स बॉन्ड को भी नहीं छोड़ा।

भारत में जैक और उसके साथियों की लोकल गुंडों से झड़प का पूरा सीन 1983 में आई जेम्स बॉन्ड (रॉजर मूर) फिल्म ‘ऑक्टोपस्सी’ से हू-ब-हू उठा लिया गया है। जैकी चान खुद एक अच्छे निर्देशक रह चुके हैं और उनकी फिल्मों में रोमांच और मनोरंजन का स्तर सीमाएं पार कर जाता है। ऐसे में किसी फिल्म की नकल की जरूरत क्या है।

हालांकि जैकी चान अपने अंदाज में फिट नजर आते हैं। साठ पार कर चुके चैन की फुर्ती आज भी देखने लायक है। कुंग फु और मार्शल आर्ट के बेहतरीन संगम से वह आज भी चौंकाते हैं। इस फिल्म में भी उन्होंने अपने चिर-परिचित स्टाइल से बांधे रखा है। और बॉलीवुड कलाकारों जैसे सोनू सूद, दिशा पटानी और अमायरा दस्तूर ने भी उनका अच्छा साथ दिया है। लेकिन टॉन्ग इन तमाम कलाकरों और इनके किरदारों को सही एक सूत्र में पिरो नहीं पाए। कहानी में भी कई जगह बिखराव और खामियां हैं। खासतौर से रोमांच के पलों में। यही नहीं टॉन्ग कई चीनी कलाकारों का भी ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाए, जबकि उनके किरदारों में कॉमेडी की गुंजाइश कूट कूटकर थी।

ये फिल्म अपने रोमांचक पलों और अच्छे एक्शन सीन्स की वजह से कुछे हिस्सों में आकर्षित करती है। अगर आप ज्यादा दिमाग न लगाएं तो ये फिल्म आपको खूब मनोरंजन परोसेगी। अगर मीन मेक निकालेंगे तो आधा घंटा भी नहीं झेल पाएंगे। आप इसे अक्षय कुमार की बिना भेजे वाली कॉमेडी फिल्म भी कह सकते

वैसे फिल्म में भारत और चीन के आपसी सौहार्द को बढ़ाने की कोशिश भी की गई है। जैकी चान ठेठ देसी अंदाज में जंचते भी है। लेकिन इसे और अच्छे ढंग से पेश करने के लिए टॉन्ग को किसी भारतीय निर्देशक की मदद भी ले लेनी चाहिए थी और अंत में एक बात कि फिल्म में कुंग फु तो है, लेकिन योगा कहां है?

सितारे: जैकी चैन, सोनू सूद, अमायरा दस्तूर, दिशा पटानी, आरिफ रहमान, जैंग यिंग, मिया मुई

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