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Posted By Naugachia_admin On Tuesday, May 10th, 2016 With 0 Comments

editor

एडमिन : मोहन पोद्दार      संपादक : ऋषभ कृष्णा मिश्रा

प्रिय पाठकों ,

कहते है नारद के बाद कबूतर, अख़बार हुए…। राजा महाराजा के अख़बार ढोल नगाड़ा थे..।

खबरनवीसी का यह क्रम चलते- चलते आज न्यू मीडिया यानी डिजिटल मीडिया तक पहुंच गया है। युवा वर्ग ने इस बदलाव को जिस तेजी से आत्मसात किया है, उसे देख कर हैरानी होती है।

नारद जी अपने आप में अपने युग के भरेपूरे अख़बार हुए। वे देववाणी का संवाद जनजन तक पहुंचाने का कार्य किया करते थे। फिर कबूतर आये। इनका उपयोग सन्देश लेने और देने में किया गया। इन्होंने भी पत्रकारों और अख़बारों जैसी भूमिका लंबे समय तक निभाई। उसके बाद राजा महाराजाओं ने अपने सन्देश वाहकों के माध्यम से गांवों के चौराहों पर ढोल नगाड़े की आवाज के साथ तुगलकी फरमान पहुंचाए। प्रिंट पत्रकारिता का युग भी आया, फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने दस्तक दी और आज डिजिटल न्यूज़पेपर के नए युग की ओर देश दुनियां तेज गति से बढ़ रही है। विकसित देशों और अपने देश की नई पीढ़ी की ऑनलाइन न्यूज़पेपर के प्रति दीवानगी हर कहीं देखी जा सकती है। शहरों से लेकर दुर्गम गांवों तक खबर को तुरंत जानने पढ़ने का प्रचलन फ़ास्ट फ़ूड की तरह बढ़ता ही जा रहा है।

विकसित देशों में अखबारी कागज के लगातार महंगे होने और पर्यावरण पर असर पड़ने के कारण समाचार पत्र प्रकाशन बंद होता जा रहा है। इसके स्थान पर ऑनलाइन मीडिया तेजी से फैल रहा है। जैसे-जैसे इंटरनेट का प्रसारण होगा और यह सस्ता होगा, लोग विकासशील देशों में भी अख़बारों को भूलने लगेंगे। हालांकि इसके लिए अभी सालों लग सकते हैं।

ऑनलाइन न्यूज़ और प्रिंट मीडिया में वही अंतर है जो फ़रारी और मारुति 800 में है। जाहिर है कि आने वाले समय में सब फ़रारी की गति से न्यूज़ जानना-पढ़ना चाहेंगे। इस दृष्टि से मुझे लगता है कि हमारे देश में भी आने वाले समय में नए मीडिया का प्रचलन तेजी के साथ बढ़ेगा। हमारी टीम इस ओर अग्रसर है  दिन रात मेहनत कर लोगो तक  फ़रारी के स्पीड में न्यूज़ पंहुचा रही है

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नवगछिया का इतिहास

नवगछिया अनुमंडल की संस्कृति में नाटक पूरी तरह से रचा बसा है. हर त्योहार, उत्सव नाटक के बिना अधूरा मना जाता है. डीजे संस्कृति के इस दौड़ में भी नवगछिया अनुमंडल में त्योहारों के मौसम में विभिन्न गांवों में करीब सौ से अधिक लंबे नाटकों का मंचन किया जाता है. नाटकों के मंचन में अपनी भागीदारी दिखाने वाले ग्रामीण कलाकार गैर व्यवसायिक होते हैं फिर भी यहां के नाटकों में ऑर्केस्ट्रा या डांस शो से ज्यादा भीड़ देखा जा सकता है. नवगछिया के कलाकार ग्रामीण रंग मंच से बड़े, छोटे परदे तक का भी सफर तय कर रहे हैं और अपने गांव का नाम रौशन कर रहे हैं. प्रसिद्ध सोनपुर मेले में विगत वर्षों नाटकों का प्रदर्शन करने वाले खरीक के राघोपुर के कलाकारों को राज्य सरकार द्वारा पुरस्कृत भी किया जा चूका है.

क्या है नवगछिया के नाटकों का इतिहास

नवगछिया में नाटकों का इतिहास लगभग सैकड़ो वर्ष पुराना है. लेकिन 18 वीं सदी के शुरूआती वर्षों से ही रात भर खेले जाने वाले नाटकों का प्रमाण मिलता है. बूढ़े बुजुर्ग कहते हैं कि नवगछिया का इलाका छै परगना के अधीन आता था और भारत में इस्ट इंडिया कंपनी के शासन से पहले नवगछिया का इलाका आलमनगर के राजा के रियासत में था. उस समय आलम नगर के राजा झौव्वन सिंह कला प्रेमी थे. उस वक्त रामायण, महाभारत, दाटा धर्मराज शैली के नाटक बाबा बिशु रॉउत, दाता धर्मराज, हरिश्चन्द्र, राजा विक्रमादित्य आदि नाटकों का मंचन किया जाता था. भारत छोड़ो आंदोलन के समय नाटक विचार अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हुआ करता था. आजादी के बाद नाटकों की परंपरा काफी समृद्ध हुई. इस समय बड़े बड़े मशालों से रंगमंच को प्रकाशमय किया जाता था और बिना किसी ध्वनि विस्तारक यंत्र के नाटकों का आयोजन किया जाता था.

वर्ष 1970 का दशक नाटकों के पुनरुत्थान के लिए स्वर्णिम काल माना जाता है. पुराने कलाकारों से मिली जानकारी के अनुसार इस दशक में कई सामाजिक नाटकों का मंचन किया गया. जिससे आमलोगों की दिनचर्या में नाटक अहम स्थान रखने लगा. इस समय कई युवा प्रगतिशील लेखकों ने नाट्य लेखन को अपना करियर भी बनाया. इस समय कई कालजयी नाटक लिखे गए. आज भी रंगमंच पर 50 फीसदी ऐसे नाटकों का मंचन होता है जो 1970 और 1980 के दशकों में लिखे गए. इन नाटकों में पराजय, टूवर, नागिन, धूल का फूल, फैंक दो हल बन्दूक उठा लो आदि प्रमुख हैं. उस समय नाटक का ऐसा क्रेज था कि नाटक के नायक की गांव में किसी फिल्म के मशहूर अभिनेता से काम नहीं थी

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