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मृत्युभोज -इस सच्चाई को जानने के बाद यकीन मानिये आप खुद जाने से मना कर देंगे

हिंदू धर्म में किसी भी व्यक्ति के मरने के बाद 13वें दिन आत्मा की शांति के ब्रह्मभोज(मृत्युभोज) का आयोजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि मरणोपरांत ब्राह्मण को भोजन कराने से मरने वाले व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है, लेकिन महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार मृत्युभोज को खाना ऊर्जा के लिए हानिकारक माना गया है।

महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है। सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः अर्थात् जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए। लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वालों के दिल में दर्द हो, वेदना हो, तो ऐसी स्थिति में कभी भोजन नहीं करना चाहिए।

बता दें कि हिन्दू धर्म में मुख्य 16 संस्कार बनाए गए है, जिसमें अन्तिम यानि 16वां संस्कार अंत्येष्टि का होता है। इस प्रकार सत्रहवां संस्कार ‘ मृत्युभोज ‘ कहाँ से। इसीलिए महर्षि दयानन्द सरस्वती, पं0 श्रीराम शर्मा, स्वामी विवेकानन्द जैसे महान मनीषियों ने मृत्युभोज का जोरदार ढंग से विरोध किया है।

जानकारी के लिए बता दें कि जानवरों से भी सीखें, जिसका साथी बिछुड़ जाने पर वो उस दिन चारा नहीं खाता है। जबकि आदमी की मृत्यु पर मृत्युभोज खाकर शोक मनाने का ढोंग रचता है। मृत्युभोज समाज में फैली कुरीति है और समाज के लिए अभिशाप है।

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